बदरा दीवाने

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जानते हो तुम कितना गहरा असर होता है तुम्हारा हम पर
तुम बरसते हो कही दूर और हरियाली इस पार छा जाती  है|

 

 तपती बिलखती धरा मनाए नही मानती किसी की बात
सिर्फ़ तुम्हे देख  बदरा दीवाने उस पे मुस्कान आती है |

 

क्यूँ अकेला छोड़ उस को तू मुक्त विहार करता फिरता है
तेरा धरा से बूँदों का संगम जब होता खुशहाली लाती है |

17 टिप्पणियाँ

  1. जून 20, 2008 at 7:54 पूर्वाह्न

    क्यूँ अकेला छोड़ उस को तू मुक्त विहार करता फिरता है

    बहुत खूब

    बरसती यह रिमझिम फुहार
    करे दिल का हाल बेहाल

    सही कहा न ..ऐसे में कविता कहना अच्छा लगता है .अच्छी लगी यह रचना

  2. जून 20, 2008 at 8:14 पूर्वाह्न

    barkha par likhi gayi rachna sundar hai!

  3. mamta said,

    जून 20, 2008 at 10:21 पूर्वाह्न

    वाह महक इतने खुबसूरत ख़याल आपको आते कहाँ से है।
    अति सुंदर।

  4. kmuskan said,

    जून 20, 2008 at 11:26 पूर्वाह्न

    waah bahut khub likha hai

    तपती बिलखती धरा मनाए नही मानती किसी की बात
    सिर्फ़ तुम्हे देख ओ बदरा दीवाने उस पे मुस्कान आती है |

  5. जून 20, 2008 at 12:16 अपराह्न

    bhut hi pyari rachana.likhati rhe.

  6. Rewa Smriti said,

    जून 20, 2008 at 12:19 अपराह्न

    क्यूँ अकेला छोड़ उस को तू मुक्त विहार करता फिरता है
    तेरा धरा से बूँदों का संगम जब होता खुशहाली लाती है |

    Very beautiful! bahut sahi likha hai Mehek…keep it up dear🙂

  7. जून 20, 2008 at 2:04 अपराह्न

    Are Wah Mahek ji ..sunder abhivyakti hai –
    likhti rahiye ,
    sa sneh,
    – lavanya

  8. mehek said,

    जून 20, 2008 at 2:32 अपराह्न

    ranju ji,nazar ji,mamta ji, muskan ji,rashmi ji,rews, lavanya ji tahe dil se shukran

  9. ramadwivedi said,

    जून 20, 2008 at 4:51 अपराह्न

    Badhyi Mahak ji,bahut achhi lagi ye panktiyaan…..sasneh…

    क्यूँ अकेला छोड़ उस को तू मुक्त विहार करता फिरता है
    तेरा धरा से बूँदों का संगम जब होता खुशहाली लाती है |

  10. जून 21, 2008 at 5:30 पूर्वाह्न

    महक जी आपकी कविता बहुत अच्छी लगी। इस पर मैंने भी अपनी पंक्तियां लिख डालीं।
    दीपक भारतदीप
    ………………..
    सूरज की गर्मी में झुलसते हुए
    पानी में नहा गया था बदन
    जलती हवाओं में
    गर्म मोम की तरह पिघल रहा था मन
    चारों तरफ फैला था क्रंदन
    ऐसे में जो आये आकाश पर बादल
    बिछ गयी पानी की चादर
    जैसे स्वर्ग का अनुभव हुआ जमीन पर
    लहराने लगा त्रस्त लोगों का बदन

    कहें महाकवि दीपक बापू
    तुम सभी जगह बरसते जाना
    जल से जीवन बहाते जाना
    किसी के भरोसे मत छोड़ना
    इस धरती पर विचरने वाले जीवों को
    बड़े बांध बनवाये या तालाब
    पर किसी की प्यास बुझाये
    यह विचार इंसान नहीं करता
    ढूंढता है अपनी चाहत के लिये
    सोने, चांदी और संगमरमर के पत्थरे जैसे निर्जीवों को
    अमीरों के आसरे तो बहुत हैं
    एक ढूंढें हजार पानी पिलाने वाले जायेंगे
    पर गरीब का आसरा हो तुम बादल
    शायद इसलिये कहलाते हो पागल
    फिर भी तुम बरसते रहना
    नहीं तो हमें रहेगा पानी के लिये तरसते रहना
    तुम हो आत्मा इस धरा की
    जो है हम सबका बदन
    ………………..

  11. Dr Anurag said,

    जून 21, 2008 at 8:40 पूर्वाह्न

    जानते हो तुम कितना गहरा असर होता है तुम्हारा हम पर
    तुम बरसते हो कही दूर और हरियाली इस पार छा जाती है|

    vah mahek…..sabke man ki baat kah di aapne……

  12. mehhekk said,

    जून 21, 2008 at 3:04 अपराह्न

    rama ji bahut shukrana

    deepak ji bahut shukrana
    sahi kaha aapne apni kavita mein insaan kisi ki pyas bujhane ki nahi sochta,bas sone chandi aur paise ke piche bhagta hai,bahut sundar kavita hai,bahut dhanyawad is ke liye bhi,zindagi ki ke sachhe wakiye pesh hote hai aapki kavita mein bahut khub

    anurag ji bahut bahut shukrana

  13. जून 21, 2008 at 3:39 अपराह्न

    थोड़ा हम भी मुस्कराना चाहते हैं, इस बदरा दीवाने को हैदराबाद की तरफ भी भेजिये ना महक..🙂
    बहुत सुन्दर भाव।

  14. जून 22, 2008 at 11:30 पूर्वाह्न

    जानते हो तुम कितना गहरा असर होता है तुम्हारा हम पर
    तुम बरसते हो कही दूर और हरियाली इस पार छा जाती है|

    bahut sunder…

  15. alpana said,

    जून 22, 2008 at 12:01 अपराह्न

    bahut pyari si kavita–
    mahak tumhara chitron ka selection bhi lajawab hai-

  16. mehhekk said,

    जून 22, 2008 at 2:30 अपराह्न

    sagar ji shukrana jarur hydbad bhi bhej denge:)

    neeraj i ,alpana ji tahe dil se shukran

  17. rohit said,

    जून 26, 2008 at 4:19 अपराह्न

    सिर्फ़ तुम्हे देख ओ बदरा दीवाने उस पे मुस्कान आती है |
    change karta hu
    tumhari kavita padk ker hi bus muskan aa jaati hai
    har bhula lamha, nazro ke samne aa jata hai
    her khusi jo bhuli, yaad aa jaata hai
    सिर्फ़ तुम्हे देख ओ बदरा दीवाने उस पे मुस्कान आती है |
    labo pe muskaan aa jati hai

    itni busy life baan dali hai haumne ki awara badal per nazar nahi padti ..kitni bakwas life hoti ja rahi hai mehak…
    kher me to kuch time nikla hi leta hu
    rohit


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