शाम सुहानी सी

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शाम सुहानी सी

धूप की चादर को हटाकर बिखर गये नीले स्याह से बादल
गरजत बरसात बूँदों का आना ,गालों पर सरका आँख का काजल |

ठंडी हवाओं का नज़दीक से गुज़रना नस नस में दौड़ती सहर
आँधियों का हमे अपने आगोश में लेना दिल में उठता कहेर |

उसी राह से हुआ तेरा आगमन ,एक छाते में चलने का निमंत्रण
नज़दीकियों में खिला खिला मन फिर भी था खामोशी का अंतर |

यूही राह पर कदम चले संग तुम्हारे कभी ना आए वो मंज़िल
बड़ी अजीब सी चाहत ,ख्वाब होते गजब के जो इश्क़ में डूबा हो दिल |

दरवाज़े तक तेरा हमे छोड़ना और मुस्कान में कुछ कोशीशन कहेना
समझ गया दिल वो अनकहे अल्फ़ाज़ और चलते हुए तेरा तोडसा रुकना |

हमशी  कह दू राज़ की बात ,ज़िंदगी की सब से थी  वो शाम सुहानी सी
रब्बा  शुक्रा में जीतने सजदे करूँ कम है उस  वक़्त तूने दुआ कबुल की |

13 टिप्पणियाँ

  1. जून 21, 2008 at 3:58 अपराह्न

    उसी राह से हुआ तेरा आगमन ,एक छाते में चलने का निमंत्रण

    एक अकेली छतरी में जब हम आधे आधे भीग रहे थे याद आ गया इसको पढ़ कर🙂 सुंदर

    हमनशी कह दू राज़ की बात ,ज़िंदगी की सब से थी वो शाम सुहानी सी
    रब्बा शुक्रान में जीतने सजदे करूँ कम है उस वक़्त तूने दुआ कबुल की |

    वाह !!अमीन🙂 बहुत सुंदर है यह रचना महक जी ..

  2. जून 21, 2008 at 5:29 अपराह्न

    वाह! स्पंदित करती हुई रचना…

    ***राजीव रंजन प्रसाद

  3. जून 21, 2008 at 5:39 अपराह्न

    bahut hi laajwab rachna.ander tak pravesh kar gai.

  4. जून 21, 2008 at 10:09 अपराह्न

    बहुत खूबसूरत कृति है, बहुत बधाई.

  5. जून 22, 2008 at 4:41 पूर्वाह्न

    bhut hi khubsurat paktiya.likhti rhe.

  6. alpana said,

    जून 22, 2008 at 12:00 अपराह्न

    kya baat hai Mahak🙂

    kya baat!!!!
    sundar kavita!

  7. जून 22, 2008 at 1:20 अपराह्न

    निहायत ख़ूबसूरत रचना लिखी है आपने। अंदाज़े-बयां, अल्फ़ाज़ों का चुनाव और
    भावों का सुंदर समन्वय देखते ही बनता है। बधाई!

  8. Rewa Smriti said,

    जून 22, 2008 at 1:42 अपराह्न

    धूप की चादर को हटाकर बिखर गये नीले स्याह से बादल
    गरजत बरसात बूँदों का आना ,गालों पर सरका आँख का काजल |

    Wah wah….
    bahut khoob likha hai….🙂

  9. mehhekk said,

    जून 22, 2008 at 2:28 अपराह्न

    aap sabhi ka tahe dil se shukrana:)

  10. जून 22, 2008 at 4:14 अपराह्न

    महक जी
    वैसे आपकी कविता बहुत गंभीर और हृदय स्पर्शी है पर मुझे इस पर व्यंग्य कविता लिखने का विचार आया। आप बहुत अच्छा और गंभीर लेेखन कर रहीं हैं यह देखकर प्रसन्नता होती है।

    वर्षा ऋतु का की पहली फुहार
    प्रेमी को मिली मोबाइल पर प्रेमिका की पुकार
    ‘चले आओ,
    घर पर अकेली हूं
    चंद लम्हे सुनाओ अपनी बात
    आज से शुरू हो गयी बरसात
    मन में जल रही है तन्हाई की ज्वाला
    आओ अपने मन भावन शब्दों से
    इस मौसम में बैठकर करें कुछ अच्छी बात
    अगर वक्त निकल गया तो
    तुम्हें दिल से निकालते हुए दूंगी दुत्कार’

    प्रेमी पहुंचा मोटर सायकिल पर
    दनादनाता हुआ उसके घर के बाहर
    चंद लोग खड़े थे वहां
    बरसात से बचने के लिये
    प्रेमिका के घर की छत का छाता बनाकर
    जिसमें था उसका चाचा भी था शामिल
    जिसने भतीजे को रुकते देखकर कहा
    ‘तुम हो लायक भतीजे जो
    चाचा को देखकर रुक गये
    लेकर चलना मुझे अपने साथ
    जब थम जाये बरसात
    आजकल इस कलियुग में ऐसे भतीजे
    कहां मिलते हैं
    मुझे आ रहा है तुम पर दुलार’

    प्रेमी का दिल बैठ गया
    अब नहीं हो सकता था प्यार
    जिसने उकसाया था वही बाधक बनी
    पहली बरसात की फुहार
    उधर से मोबाइल पर आई प्रेमिका की फिर पुकार
    प्रेमी बोला
    ‘भले ही मौसम सुहाना हो गया
    पर इस तरह मिलने का फैशन भी पुराना हो गया है
    करेंगे अब नया सिलसिला शुरू
    तुम होटल में पहुंच जाओ यार
    इस समय तो तुम तो घर में हो
    मैं नीचे छत को ही छाता बनाकर
    अपने चाचा के साथ खड़ा हूं
    बीच धारा में अड़ा हूूं
    जब होगी बरसात मुझे भी जाना होगा
    फिर लौटकर आना होगा
    करना होगा तुम्हें इंतजार’

    प्रेमिका इशारे में समझ गयी और बोली
    ‘जब तक चाचा को छोड़कर आओगे
    मुझे अपने से दूर पाओगे
    कहीं मेरे परिवार वाले भी इसी तरह फंसे है
    करती हूं मैं अपने वेटिंग में पड़े
    नंबर एक को पुकार
    तुम मत करना अब मेरे को दुलार’

    थोड़ी देर में देखा प्रेमी ने
    वेटिंग में नंबर वन पर खड़ा उसका विरोधी
    कंफर्म होने की खुशी में कार पर आया
    और सीना तानकर दरवाजे से प्रवेश पाया
    उदास प्रेमी ने चाचा को देखकर कहा
    ‘आप भी कहां आकर खड़े हुए
    नहीं ले सकते थे भीगने का मजा
    इस छत के नीचे खड़े होने पर
    ऐसा लग रहा है जैसे पा रहे हों सजा
    झेलना चाहिए थी आपको
    बरसात की पहली फुहार’

    चाचा ने कहा
    ‘ठीक है दोनों ही चलते हैं
    मोटर सायकिल पर जल्दी पहुंच जायेंगे
    कुछ भीगने का मजा भी उठायेंगे
    आखिर है बरसात की पहली फुहार’

    प्रेमी भतीजे ने मोटर साइकिल
    चालू करते हुए आसमान में देखा
    और कहा-
    ‘ऊपर वाले बरसात बनानी तो
    मकानों की छत बड़ी नहीं बनाना था
    जो बनती हैं किसी का छाता
    तो किसी की छाती पर आग बरसाती हैं
    चाहे होती हो बरसात की पहली फुहार
    ………………………….

  11. Annapurna said,

    जून 23, 2008 at 6:05 पूर्वाह्न

    छाते में साथ-साथ चलते नरगिस राजकपूर याद आ गए

  12. rohit said,

    जून 26, 2008 at 4:22 अपराह्न

    mehlak
    wah wah shaam shunai madosh kiye jaye…
    jane kai geet yaad aa gai

    mehak behed hi khubsoort lafz hai
    rohit

  13. Shail said,

    सितम्बर 13, 2008 at 7:03 अपराह्न

    mehek jee aapki rachna bahut hi khoobsurat, bahut hi pyari hai. ise padhkar dil mein khushnuma ehsas ke pal jaag uthe hain. mujhe ek film ki ek line yaad aa rahi hai…..
    kabhi-kabhi kisi dhun ko sunne ke liye sanso ki jarurat nahi hoti……
    phoolon ke khilne ke liye barish ki jarurat nahi hoti.., aur
    Dil ki baaton ko janne ke liye lafzon ki jarurat nahi hoti……..


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