खुद से मिलना ज़रूरी होता है

दुनिया की भीड़ में खुद को ढालना  ज़रूरी होता है

 

दो पल बैठ किनारे कभी खुद से मिलना  ज़रूरी होता है |

 

 

 

दर्दधूप में जिगर जलते हुए हसना ज़रूरी होता है

 

जज़्बातों की बाढ़ बह जाए दिल से तब रोना ज़रूरी होता है |

 

 

 

उमरराहकदम में हमसफ़र होना ज़रूरी होता है

 

यहा सब को कुछ पाने के लिए कुछ खोना ज़रूरी होता है |

 

 

18 टिप्पणियाँ

  1. जून 24, 2008 at 9:52 पूर्वाह्न

    उमर-ओ-राह –ए-कदम में हमसफ़र होना ज़रूरी होता है
    यहाँ सब को कुछ पाने के लिए कुछ खोना ज़रूरी होता है |
    सही कहा ..सुंदर भाव

  2. Sanjay Sharma said,

    जून 24, 2008 at 10:12 पूर्वाह्न

    सारगर्भित रचना ! काश कोई ख़ुद से मिल पाता ! कई जरूरी काम रह जाता है,अतः अनिवार्य कर दिया जाय.
    शुभकामना !

  3. कुश said,

    जून 24, 2008 at 10:16 पूर्वाह्न

    दो पल बैठ किनारे कभी खुद से मिलना ज़रूरी होता है

    बिल्कुल ठीक कहा आपने महक जी.. बहुत अच्छे

  4. sushil said,

    जून 24, 2008 at 1:14 अपराह्न

    बहुत सुन्दर क्या बात है

    दो पल बैठ किनारे कभी खुद से मिलना ज़रूरी होता है

  5. जून 24, 2008 at 1:22 अपराह्न

    “यहा सब को कुछ पाने के लिए कुछ खोना ज़रूरी होता है |”
    इस पंक्ति ने जिंदगी की सच्चाई को बयाँ कर दिया है। बधाई।

  6. Rewa Smriti said,

    जून 24, 2008 at 3:58 अपराह्न

    यहा सब को कुछ पाने के लिए कुछ खोना ज़रूरी होता है |

    Bahut sahi likha hai. Superb…

    कुछ पाकर खोना है, कुछ खोकर पाना है
    जीवन का मतलब तो आना और जाना है
    दो पल के जीवन से एक उम्र चुरानी है……

  7. जून 24, 2008 at 5:17 अपराह्न

    महक जी आपकी कविताएं अब दिल को छूने लगीं हैं। इसलिये मेरे मन में भी काव्यात्मक भाव आ जाते हैं। बहुत बढि़या।
    दीपक भारतदीप
    ………………………………….
    भीड़ में हमेशा खोते रहे
    अपने से न मिलने के गम में रोते रहे
    नहीं ढूंढा अपने को अंदर
    आदमी होकर भी रहा बंदर
    लोगों के शोर को सुनकर ही बहलाया दिल
    अपनी अक्ल की आंख बंद कर सोते रहे

    जमाने भर का बेजान सामान
    जुटाते हुए सभी पल गंवा दिये
    दिल का चैन फिर नहीं मिला
    जो आज आया था घर में
    उसी से ही कल हो गया गिला
    उठाये रहे अपने ऊपर भ्रम का बोझ
    सच समझ कर उसे ढोते रहे
    कब आराम मिले इस पर रोते रहे
    झांका नहीं अपने अंदर
    मिले नहीं अपने अंदर बैठे शख्स से
    अकेले होने के गम में इसलिये रोते रहे
    ………………………….

  8. meenakshi said,

    जून 24, 2008 at 8:07 अपराह्न

    बहुत गहरा अर्थ ….. सच है…कुछ खो कर ही कुछ पाया जा सकता है….

  9. जून 25, 2008 at 12:32 पूर्वाह्न

    दुनिया की भीड़ में खुद को ढालना ज़रूरी होता है
    दो पल बैठ किनारे कभी खुद से मिलना ज़रूरी होता है |

    –क्या बात है..बहुत बढ़िया.

  10. Annapurna said,

    जून 25, 2008 at 4:20 पूर्वाह्न

    दर्द-ए-धूप में जिगर जलते हुए हँसना ज़रूरी होता है

    कहीं ये जिगर मुरादाबादी का शेर तो नहीं…

  11. Dr Anurag said,

    जून 25, 2008 at 6:12 पूर्वाह्न

    निया की भीड़ में खुद को ढालना ज़रूरी होता है
    दो पल बैठ किनारे कभी खुद से मिलना ज़रूरी होता है |

    bahut khoob …mahak ..ye sher bahut pasand aaya……

  12. mehhekk said,

    जून 25, 2008 at 7:28 पूर्वाह्न

    aap sabhi ka tahe dil se shukrana

  13. जून 25, 2008 at 8:44 पूर्वाह्न

    bhut sahi bat.ati uttam.badhai ho.

  14. Taeer said,

    जून 26, 2008 at 11:23 पूर्वाह्न

    दर्द-ए-धूप में जिगर जलते हुए हसना ज़रूरी होता है
    जज़्बातों की बाढ़ बह जाए दिल से तब रोना ज़रूरी होता है |

    dil chho liya aap ne…

  15. alpana said,

    जून 27, 2008 at 6:55 पूर्वाह्न

    दुनिया की भीड़ में खुद को ढालना ज़रूरी होता है

    दो पल बैठ किनारे कभी खुद से मिलना ज़रूरी होता है |
    kya baat hai Mahak ,tumne to haqiqat bayan kar di!
    bahut achchee rachna likhi hai–

  16. Tanu Shree said,

    जून 27, 2008 at 12:32 अपराह्न

    दो पल बैठ किनारे कभी खुद से मिलना ज़रूरी होता है |
    :
    :
    जज़्बातों की बाढ़ बह जाए दिल से तब रोना ज़रूरी होता है |

    Beautiful words mehekk …. just beautiful .. very true…

  17. जून 28, 2008 at 12:53 अपराह्न

    वाह गजब हमें तो आज ही पता चला कि इतना सुंदर कोई ब्‍लाग यहां पर भी छिपा बैठा है अब तो हम रोज के मुसाफिर हो गए समझो बहुत अच्‍छा लिखते हो बधाई हो आपको

  18. ashish said,

    जून 12, 2010 at 5:59 पूर्वाह्न

    Sach me bhai aap ki kavita our uska DEEPAK dvara diya gya uttr man ko anadr tak jhkjhor gya bhai……………


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