मुस्कान भरी तितलियाँ

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कुछ खास है आज की सुबह में ? नही तो वैसी ही है रोज के जैसी|
बाहर चाहे जितनी चहल पहल हो , मन के अंदर तो वही  उधेड़ बुन
अपना सर उठाए खड़ी है | फिर देर हो गयी उठने में ? कितने काम बाकी
है | काश कुछ काम रात में कर लेती,आलसी कही की | दूध उबलने तक
कुछ और काम करलूँ,हाय मुआ पूरा दूध उबल उबल के गॅस के उपर से
बह कर नदी में तपदील हो चुका था |और  एक एक्सट्रा काम,सफाई का | 

अब चा तो नसीब नही आज | कोई कपड़ा लेकर सफाई कर दूं | देर हो जाए उस दिन ही
काम पर जल्दी भी जाना होता है,उसी दिन सब ग़लत क्यूँ होता है ?
    ये क्या खिड़की से कौन झाक रहा है ? ज़रा देखूं नज़दीक जाके | इतने सारे उड़ते हुए रंग |
खूबसूरती का अंबार | हम तो भूल ही गये पिछले पल ही कितने सवालों से घिरा मन सब भूल कर
इन रंगों में घुल भी गया | कौन हो तुम सब ? कहा से आई हो ? पहले कभी नही देखा ?

      आरे हमे नही पहचाना , हम तो तुम्हारी अपनी है ,बचपन की संगिनी | तब तो तुम
सुबह उठते ही हमारी याद करती,खिलखिलाती | तुम्हारी खुशियाँ,तुम्हारी मुस्कान भरी
तितलियाँ |

  रोज तो नही नज़र आती हमे आप सब ?  हम तो सालों से तुम्हारे आसपास है |
जैसे तुम बड़ी हुई,अपने आसपास नाहक के छोटे छोटे परिशानियों का जाल बुन रखा है |
तोड़ दो ना उसे | आओ हमे डो | शायद मेरा मन बचपन अब तक ज़िंदा है |
   दौड़ के भागी उन्हे पकड़ने | ये क्या तुम सब तो उड़ के जा रही हो,कैसे  पकडू ?
थोड़ी सी कोशिश तो करो , और थोड़ी सी :) | देखा मुस्कान और खुशियों के नूर
तुम्हारी लबों और आँखों में भी है | उनके रंग तुम पर भी सजते है ,फब्ते है | अब भूलॉगी 
तो नही ना हमे ?

      नही नही कभी नही,तुम सब भी वादा करों सदा हमारे साथ रहोगी |
 वादा पक्का वादा रहा | 

        इतनी उँची उड़ान लेकर कहा जा रही हो सब अभी ?
तुमसी ही किसी और के मुस्कानी रंग खोए होगे कही , उन्हे दोबारा रंगने |
खुशियों के फूल तो हर सुबह हमारे द्वारे खिलते है और मुस्कान की तितलिया रोज उन पर 
आती है | बस उन के रंगो को अंतर पटल पर प्रतिबिंबित और परावर्तित करना होता है |

18 टिप्पणियाँ

  1. जून 25, 2008 at 7:38 पूर्वाह्न

    🙂 पढ़ते पढ़ते मुस्कान आ गई बचपन हर इंसान में रहता है पर कोई उसको जीता है कोई उसको नही जीता
    बहुत अच्छा लिखा है आपने .दिल के बचपने की इस हलचल को🙂

  2. कुश said,

    जून 25, 2008 at 8:01 पूर्वाह्न

    आपका ये रूप पहली बार देखा.. बहुत अच्छा लिखा है आपने.. व्यस्त जीवन में खुशियो की बौछारे ठंडक देती है..

  3. Dr Anurag said,

    जून 25, 2008 at 8:59 पूर्वाह्न

    बस आज असली महक के भीतर झाँका है…..उम्मीद है ये खिड़की अभी ओर खुशबू बिखेरेगी..

  4. mamta said,

    जून 25, 2008 at 10:11 पूर्वाह्न

    महक अभी २-३ दिन पहले सुबह walk करते हुए अचानक ही कुछ तितलियाँ दिखी थी और हम कुछ सोचने लगे थे और आज आपकी ये पोस्ट पढ़कर बरबस वो तितलियाँ याद आ गई। और इतने प्यारे अंदाज मे आपने रंग बिखेरा है की मुस्कराए बिना नही रह सके।

    बहुत बढ़िया।

  5. Gaurtalab said,

    जून 25, 2008 at 1:01 अपराह्न

    बहुत अच्छा लिखा है आपने…… बहुत बढ़िया।

  6. जून 25, 2008 at 3:09 अपराह्न

    ऐसे ही महकती रहें..बहुत बढ़िया लिखा है. बधाई.

  7. maya said,

    जून 25, 2008 at 3:29 अपराह्न

    बहुत सुन्दर लेख,सच है मुस्कान बच्पन के साथ ही खो जाता है जिसे हम फिर से सहेज सकते है

  8. GIRISH BILLORE said,

    जून 25, 2008 at 7:54 अपराह्न

    ati man bhavan alekh

  9. menka said,

    जून 25, 2008 at 8:32 अपराह्न

    aaj padh ke achha laga..i feel relaxed. Thanks

  10. Annapurna said,

    जून 26, 2008 at 4:35 पूर्वाह्न

    महकती पोस्ट !

  11. RAZIA MIRZA said,

    जून 26, 2008 at 5:54 पूर्वाह्न

    मुस्कान भरी तितलीयां अपनी यादों के रंग बिखेरे एक “महेक” छोड जाती है!

  12. जून 26, 2008 at 6:06 पूर्वाह्न

    अआपने जितना बढ़िया पोस्ट लिखा है उससे कही अच्छी भाव है. बेहद सुंदर… दिमाग नही दिल को छुने वाली

  13. Taeer said,

    जून 26, 2008 at 11:27 पूर्वाह्न

    khubsurat khayalat…bahot badhiya…

  14. meenakshi said,

    जून 26, 2008 at 12:48 अपराह्न

    आपका यह महकता अन्दाज़ भी मनमोहक है… बेहद खूबसूरत तितली से भाव…..

  15. rohit said,

    जून 26, 2008 at 4:05 अपराह्न

    well
    kiya kahne ..isis tahre tum bhi khilkhlati raha karo…
    rohit

  16. mehhekk said,

    जून 26, 2008 at 5:19 अपराह्न

    aap sabhi ka tahe dil se shukrana

  17. alpana said,

    जून 27, 2008 at 6:58 पूर्वाह्न

    खुशियों के फूल तो हर सुबह हमारे द्वारे खिलते है और मुस्कान की तितलिया रोज उन पर
    आती है | बस उन के रंगो को अंतर पटल पर प्रतिबिंबित और परावर्तित करना होता है |
    bahut gahari si baat kah gayee ho in akhir panktiyon mein.

    waise lucky ho ki titliyan dekhne ko milti hai–mujhe to saalon ho gaye -titli dekhe hue–

    bachpan mein hi dekhi thin…wo yaaden aaj taza ho gayeen.


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