ख़यालों में

 

ख़यालों में

 

 

 

जब तुम पास नही होते

 

 

या पास होकर भी दूर होते हो

 

 

तेरा ही ख़याल करती हूँ मैं

 

 

पलकों के पर्दे पर तेरा चित्र बनाती

 

 

उन में प्यार के रंग भर देती

 

 

बेहोशी का आलम , मैं तुझे निहारती

 

 

कभी तुम भी आकर देखो

 

 

हमारे ख़यालों में ,

 

 

तेरे लिए क्या सोचती हूँ मैं

 

 

कभी तुम भी मुड़कर देखों ,

 

 

तेरे ख़यालों में डूबी हुई

 

 

हक़ीक़त में कैसी लगती हूँ मैं |

 

 

 

14 टिप्पणियाँ

  1. जून 29, 2008 at 3:14 पूर्वाह्न

    तेरे ख़यालों में डूबी हुई
    हक़ीक़त में कैसी लगती हूँ मैं |

    शायद एक खुबसूरत ख्याल को तस्वीर जैसी 🙂
    मन की हलचल को बताती हुई एक सुंदर रचना लगी महक जी यह आपकी🙂

  2. mehek said,

    जून 29, 2008 at 3:24 पूर्वाह्न

    bahut shukran ranju🙂

  3. जून 29, 2008 at 8:49 पूर्वाह्न

    bhut sundar bhav ke sath sundar rachana. likhati rhe.

  4. rohit said,

    जून 29, 2008 at 11:11 पूर्वाह्न

    जब तुम पास नही होते
    या पास होकर भी दूर होते हो
    तेरा ही ख़याल करती हूँ मैं
    पलकों के पर्दे पर तेरा चित्र बनाती

    kais lagti ho
    kia kahne
    saach me jo tu mud ke dekh le sajna …
    to sajna sawar jaaye mera

    wah mahak
    well done
    rohit

  5. जून 29, 2008 at 12:28 अपराह्न

    महक जी
    आपकी इस छोटी कवित पर मेरे मन यह पंक्तियां कहने का चाह रहा है।
    दीपक भारतदीप
    ………………………………
    मन का समंदर है गहरा
    जहां ख्याल तैरते हैं जलचर की तरह
    कुछ मछलियां सुंदर लगती हैं
    कुछ लगते हैं खौफनाक मगरमच्छ की तरह

    देखने का अपना अपना नजरिया है
    मोहब्बत हर शय को खूबसूरत बना देती है
    नफरत से फूल भी चुभते हैं कांटे की तरह
    इस चमन में बहती है कभी ठंडी तो कभी गर्म हवा
    मन जैसा चाहे नाचे या चीखे
    नहीं उसके दर्द की दवा
    न एक जगह ठहरते
    न एक जैसा रूप धरते
    ख्याल तो हैं बहते जलचर की तरह
    …………………………..

  6. जून 29, 2008 at 1:38 अपराह्न

    तेरे ख़यालों में डूबी हुई
    हक़ीक़त में कैसी लगती हूँ मैं |

    –बहुत उम्दा रचना है. वाह!! बधाई.

  7. Rewa Smriti said,

    जून 29, 2008 at 3:58 अपराह्न

    Bahut sunder Mehek….

    kabhi kabhi mere dil mein bhi ye khayal aata hai🙂😉

  8. जून 29, 2008 at 4:41 अपराह्न

    Shabda mahek rahe hai

  9. mehek said,

    जून 29, 2008 at 5:10 अपराह्न

    rashmi ji shukran

    rohit ji shukran,saajan ke liye sajni saje ab wo zamane gaye:) , aaj to khud ke liye dono bhi sajte hai,ha ha if i take writing poems as ma soul profession,then what will i eat🙂,sthethscope is ma annadata:)

    depak ji shukran,khayal ke sahi roop bayan kiye hai aapne.

    sameer ji shukran

    rews shukrana,aapke dil mein palash bas palash ke khayal hote hai,kya hum nahi jante:)

    anil ji bahut shukran aur swagatam bhi blog par

  10. जून 29, 2008 at 5:59 अपराह्न

    shaayad apni is kavita ki tarah sundar! am I right?

  11. mehhekk said,

    जून 30, 2008 at 2:54 पूर्वाह्न

    nazar ji bahut sahi😉 shukran

  12. rakhshanda said,

    जून 30, 2008 at 6:04 पूर्वाह्न

    bahut sundar mahek ji,dil ko touch kar gayi…

  13. Dr Anurag said,

    जून 30, 2008 at 2:22 अपराह्न

    kabhi mudkar to dekho…..sab kuch is line me byaan kar gay aap…..ek sundar ahsas utna hi imandaar….

  14. Shubhashish Pandey said,

    जुलाई 1, 2008 at 5:32 पूर्वाह्न

    तेरे ख़यालों में डूबी हुई
    हक़ीक़त में कैसी लगती हूँ मैं |

    bahut khub


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