गुलाबी चूड़ीयां

गुलाबी चूड़ीयां

घर से जब भी शमा के पैर बेवजह बाहर निकलते , सीधा पास स्थित समंदर के किनारे पर ही रुकते |
भीगी रेत पर कदमों को छूते हुए पानी में घंटों खड़ी हो जाती | मन का उल्हास हो या गम का एहसास
सब उस विशाल नीलाई से बाटती या बहा देती |

       आज भी वो अपनी खुशी जताने आई थी | कल देव जो आनेवाला था | दो महीने पहले ही मिली थी
उससे , सब सपनासा लग रहा था आज शमा को | और अब दो दिन बाद ही सगाई की रसम भी थी |
शमा ने मन ही मन अपने नील सागर  साथी को  निमंत्रण  भी दे दिया | आज तक मेरे साथी रहे हो तुम, दो
दिन बाद कोई और होगा, नील तुमसे मिलने आती रहूंगी,मगर अब अपने देव के साथ | हो सके तो आना
अथिति बनकर |

   आँखे मूंद अपने ही ख़यालों में खोई शमा की तन्द्रि किसी के आवाज़ से टूटी |
 ” शमा .शमा”
मुड़कर देखती  अपने आँखों पर विश्वास नही हुआ उससे |
” देव ,तुम आज, अभी यहा,तुम तो कल आने वेल थे ?” पूछती रह गयी |
” हा , मगर तुमसे मिलने आया हूँ | देखो तो सगाई पर तुम्हारे फरमाइश की गुलाबी चूड़ीयां भी लाया हूँ |
बस अचानक ही आना पड़ा , पहेन के दिखाओ तो कैसी लग रही है | ”

  ” समझी किसी को बताए बिना यूही पहले आ गये  और वो भी मुझ से मिलने , देखो तो चूड़िया बहुत
सुंदर है |” शमा

” हा शमा तुम्हारी कलाई पर जच रही है |अब मुझे चलना होगा,मुझे याद करोगी ना कभी |”
 “ये क्या बचपाना है , हा हा याद करूँगी | तुम भी ना देव ,मज़ाक करते हो बहोत ” शमा |
चूड़ियों को सहलाती शमा की आँखें उपर उठी लेकिन वहा कोई नही था |सोचने लगी इतनी जल्दी
कहा चला गया |खैर उसस्के घर पहुँच ने से पहले ,मैं ही सब को खबर कर देती हूँ ,के देव आया है |

     मोबाइल उठा कर वो किसी को कह पति,उसका ही फोन बज उठा |
” आप्पा , मैं आपको ही फोन कर रही थी,आप जानते है देव आया है आज ही ,आप सब को बता देना,
उसका प्लान फैल हो जाएगा, एक दिन पहले आकर सब को धोका देना चाहता है वो |” शमा बोल पड़ी |

  ” शमा तू घर आजा,देव के घर ही जाना है |” आप्पा

” आपको तो मुझ से भी पहले पता है ,वो आया है,ये क्या आप्पा,मगर अभी तो वो मुझसे मिलकर गया है,
ठीक है आती हूँ | ” शमा
 
अपने आप्पा के साथ देव के घर पहुँचते ही उसकी मुस्कान ना जाने कहा खो गयी | देव की फोटो पर माला,सामने
दिया और सिसकते लोग देख वो निस्तब्ध देखती रही \

   ” कुछ नही बचा शमा , लाश भी न मिली,समंदर की लहरे उससे दूर ले गयी ,बहुत दूर |” आप्पा

” बची है आप्पा,ये गुलाबी चूड़ीयां बची है |”……………………

16 टिप्पणियाँ

  1. जुलाई 1, 2008 at 3:40 अपराह्न

    Mahakji, aapki ye kahani to mujhe rula gai. bhut sundar. likhati rhe.

  2. जुलाई 1, 2008 at 4:10 अपराह्न

    महक जी,कहानी इतनी मार्मिक है की ह्रदय को छू गई.

  3. कुश said,

    जुलाई 1, 2008 at 4:49 अपराह्न

    इस बार तो आपने कमाल कर दिया.. बहुत संवेदणापूर्ण कहानी..

  4. Satish said,

    जुलाई 1, 2008 at 5:04 अपराह्न

    रोचक,मार्मिक….

  5. जुलाई 1, 2008 at 5:36 अपराह्न

    रोमाँच और गहरा रोमाँस साथ साथ –
    बहुत अच्छी लगी आपकी ये कहानी

  6. kmuskan said,

    जुलाई 1, 2008 at 5:42 अपराह्न

    महक जी

    बहुत मार्मिक…………ह्रदय को छू गई.

  7. sameerlal said,

    जुलाई 2, 2008 at 12:04 पूर्वाह्न

    एकदम तरलता से पूरा मर्म दिल में उतर गया. अति मार्मिक. और लिखिये.

  8. Shrddha said,

    जुलाई 2, 2008 at 2:14 पूर्वाह्न

    तरल हो गयी आँखें आपकी कहानी पढ़ कर ,

    Shrddha
    http://bheegigazal.blogspot.com

  9. Rewa Smriti said,

    जुलाई 2, 2008 at 2:43 पूर्वाह्न

    Mehek ye post padhkar to aankhon mein aanshu aa gaye…….

  10. mehek said,

    जुलाई 2, 2008 at 4:26 पूर्वाह्न

    aap sabhi ka bahut bahut shukrana kahani pasand karne ke liye.,hamara maksad kisi ko rulana nahi tha,,maafi chahungi sab se.

  11. Rewa Smriti said,

    जुलाई 2, 2008 at 5:26 पूर्वाह्न

    Mehek, after reading the title of this story I got to remind a poem written by poet Nagarjun! I read it in school time in course, hope you wil like it.

    Title: गुलाबी चूड़ियाँ

    प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,

    सात साल की बच्ची का पिता तो है!

    सामने गियर से उपर

    हुक से लटका रक्खी हैं

    काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी

    बस की रफ़्तार के मुताबिक

    हिलती रहती हैं…

    झुककर मैंने पूछ लिया

    खा गया मानो झटका

    अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा

    आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब

    लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया

    टाँगे हुए है कई दिनों से

    अपनी अमानत

    यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने

    मैं भी सोचता हूँ

    क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ

    किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?

    और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा

    और मैंने एक नज़र उसे देखा

    छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में

    तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर

    और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर

    और मैंने झुककर कहा –

    हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ

    वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे

    वर्ना किसे नहीं भाएँगी?

    नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

    रचनाकार: नागार्जुन

  12. mehek said,

    जुलाई 2, 2008 at 5:49 पूर्वाह्न

    rews ye nanhi gudiyan ke gulabi chudiyon ka pyara rishta apne pita ke sath bahut marmsprashi hai,sundar kavita

  13. Annapurna said,

    जुलाई 2, 2008 at 6:19 पूर्वाह्न

    बहुत भावुक !

  14. Shubhashish Pandey said,

    जुलाई 2, 2008 at 7:26 पूर्वाह्न

    kya baat hai
    bahut khoob
    aap to kahanikar bhi ho gayin🙂

  15. vimal sapna said,

    जुलाई 2, 2008 at 7:27 पूर्वाह्न

    tera sath ho na saka pura reh gayi majbooriyan.
    tu karib tha jitna utni hi de di duriyan.
    kya kya sapne dekha kiye hamne. kya kya umiden pali thi
    kuch n bacha reh gayi teri gulabi chudiyan………….. tumhare liye
    kabhi kabhi ham bhi likh lete hai . hai aapki hi kahani…

  16. rohit said,

    जुलाई 6, 2008 at 6:03 अपराह्न

    Mehak
    Sundar Kahani hai, Gulabi Chudia Dil me Dard Ban kar aur Ankho me Aasoo Bankar Hamesh Hi rahege. kisi na kisi ke dard hoga hi, jo shabdo me aya hai.
    Bahut Khoob!!!!Salam Khani Ki rachnakar ko

    Rohit


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