राही हो सफ़र का बुलंद

राही हो सफ़र का बुलंद कदम मीलों चल गये
याद आते है अक्सर बीते खुशियों के पल गये |

तुमने लाख संभाला हमे उस चिकनी ढलान पर
ज़िद्द थी खुद सवारेन्गे मुक़द्दर और फिसल गये |

एक साथ जो समेटना चाहा आसमानी तारों को
जब मुट्ठी खोली देखा सब काँच में बदल गये |

हज़ारों नादानियों के बाद भी  हम साया बने रहे
आँचल को पकड़ कर  तेरी बच्चो से मचल गये |

तकदीर का हर पहलू बड़ा अजीब होता है ”महक
लंबी क्यों नज़र आए  सड़क जिधर निकल गये |

4 टिप्पणियाँ

  1. Rewa Smriti said,

    जुलाई 5, 2008 at 8:07 पूर्वाह्न

    हज़ारों नादानियों के बाद भी हम साया बने रहे
    आँचल को पकड़ कर तेरी बच्चो से मचल गये |

    तकदीर का हर पहलू बड़ा अजीब होता है ”महक“
    लंबी क्यों नज़र आए सड़क जिधर निकल गये |

    Hmmm….bahut khub mohtarma!

  2. जुलाई 6, 2008 at 5:03 अपराह्न

    महक जी,
    बहुत ही उम्दा नज़्म है,राही और रास्ता कभी न ख़त्म होने वाली एक दास्ताँ है जिसे आपने इस नज़्म के ज़रिये बखूबी निभाया है.

  3. rohit said,

    जुलाई 6, 2008 at 5:49 अपराह्न

    Mehak
    तकदीर का हर पहलू बड़ा अजीब होता है ”महक“
    लंबी क्यों नज़र आए सड़क जिधर निकल गये |
    Ek hi jawab Nazar Aata hai…

    Safar Sadak aur lambe ho jate hai,
    jab intzaar kisi ka hota hai..
    Intzaar Kab Khatam Hota hai..
    Jab Kisi Ka Intazaar Hota hai..

    Per Kiska?…Mehak

    Rohit

  4. जुलाई 7, 2008 at 5:37 अपराह्न

    bahut acche mahek ji…

    एक साथ जो समेटना चाहा आसमानी तारों को
    जब मुट्ठी खोली देखा सब काँच में बदल गये |

    लंबी क्यों नज़र आए सड़क जिधर निकल गये

    kya baat hai..!!!


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