आशाओं की बूंदे

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दिल की राह पर चलते हुए
अक्सर कुछ अनकहे मोड़ आते है
राह वही पर मंज़िले बदल जाती है
कुछ पल अकेले ,कुछ पल तन्हा भी सुकून देते है
अगले मोड़ कोई और जुड़ जाता है , चुपके से
पता भी नही चलता , कब मंज़िल आती है
हर बरसे बादल के साथ क्या सब धूल जाता है?
यादों की लकीरें भी मिट जाती है?
शायद नही , शायद हाकही बंद ज़रूर होती है
राह आसान तो नही कोई , ठोकर किसी वक़्त लगती है
मुश्किल ना हो तो खुशियों की एहमियात नही रहती
सब भीग जाने के बाद , जो आशाओं की बूंदे गिरती है
किस्म उन्हे उमीद कहती है 
यकीन था हमे , वो टुकड़े ख्वाबों को फिर सिलती है
गिरने दो उन बूँदों को खुद परतब महसूस करना
रौशनसोनम  दिल से फिर जुड़ती है…..

13 टिप्पणियाँ

  1. meenakshi said,

    सितम्बर 7, 2008 at 6:14 अपराह्न

    मुश्किल ना हो तो खुशियों की एहमियात नही रहती — सौ फीसदी सच है…. जीने का मज़ा भी इसी तरह आता है..

  2. सितम्बर 7, 2008 at 6:58 अपराह्न

    क्या बात है!!! बहुत खूब!! वाह!

  3. सितम्बर 7, 2008 at 7:27 अपराह्न

    Bahut khub

  4. ranju said,

    सितम्बर 8, 2008 at 7:55 पूर्वाह्न

    अच्छी लगी आपकी यह कविता

  5. rashmi prabha said,

    सितम्बर 8, 2008 at 8:56 पूर्वाह्न

    दिल की राह पर चलते हुए
    अक्सर कुछ अनकहे मोड़ आते है ……
    aur wahin se shuru hota hain ankahe jazbaaton ka
    anant silsila……..bahut kuch hai isme kuch hatkar
    bahut achhi,bahut komal…………

  6. ramadwivedi said,

    सितम्बर 8, 2008 at 12:20 अपराह्न

    दिल की राह पर चलते हुए
    अक्सर कुछ अनकहे मोड़ आते है
    राह वही पर मंज़िले बदल जाती है
    ye panktiyaan bahut saarthak lagi…shubhakaamnaao sahit…

  7. Dr Anurag said,

    सितम्बर 8, 2008 at 2:04 अपराह्न

    शायद नही , शायद हा, कही बंद ज़रूर होती है
    राह आसान तो नही कोई , ठोकर किसी वक़्त लगती है
    मुश्किल ना हो तो खुशियों की एहमियात नही रहती
    सब भीग जाने के बाद , जो आशाओं की बूंदे गिरती है
    किस्मत उन्हे उमीद कहती है

    इन दिनों उदासी दिखती है ,आपकी कविता में बहुत ?????

  8. menka said,

    सितम्बर 8, 2008 at 7:57 अपराह्न

    aapne sach hi likha hai…hamesha likhte rahiye.

  9. swati said,

    सितम्बर 10, 2008 at 5:35 पूर्वाह्न

    bahut hi sundar rachna……sasneh

  10. सितम्बर 10, 2008 at 10:42 पूर्वाह्न

    Mehak ji bahut sundar kavita…… yaha to ek hi kavita likhne mein 2 mahine lag gaye.. aur aap hai ki har hafte nayi kavita likh deti hai🙂

    New Post :
    I don’t want to love you… but I do….

  11. सितम्बर 12, 2008 at 5:28 पूर्वाह्न

    “कुछ पल अकेले ,कुछ पल तन्हा भी सुकून देते है” Kabhi kabhi akele baithe hue aasman takna mujhe bahut acha lagta hai.. kabhi kabhi chahta hu ki ko jau kisi bheed mein jaha koi bhi na pehchanta ho mujhe….

    New Post :
    I don’t want to love you… but I do….

  12. pallavi trivedi said,

    सितम्बर 12, 2008 at 6:20 पूर्वाह्न

    कविता तो अच्छी है मगर उदासी से बिखर गयी हर तरफ….

  13. janaksingh said,

    सितम्बर 15, 2008 at 11:48 पूर्वाह्न

    hi hellooooooooooo


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