कुछ जज़्बात

कुछ जज़्बात , कुछ भावनाये ,

क्यूँ आती है उमड़ कर  

हौलेसे बिन बुलाए मेहमान की तरह रूक जाती है

 

कभी कुछ कहती है , कभी यूही खामोशी से रहती है

 

 

एक ल़हेर सी उछल जाती है ,कभी तरंग बन थिरकती है

 

 कभी दिल के कोने में छुपी हुई पाती हूँ उन्हे

 कभी खुल खुलकर बरसती है बेईमान हो हमसे

 सब के सामने आकर बहती है ,हमे भी भिगो देती है

 कई बार रुसवा कर देती है , कभी हथेली पर

छोड़ जाती है खुशी के दो मोती
हर रूप में उनके , हमे बहा कर ले जाती है……….

 

 

 

4 टिप्पणियाँ

  1. सितम्बर 13, 2008 at 4:54 अपराह्न

    कभी दिल के कोने में छुपी हुई पाती हूँ उन्हे

    कभी खुल खुलकर बरसती है बेईमान हो हमसे

    सब के सामने आकर बहती है ,हमे भी भिगो देती है

    कई बार रुसवा कर देती है , कभी हथेली पर

    छोड़ जाती है खुशी के दो मोती
    हर रूप में उनके , हमे बहा कर ले जाती है
    bahut achcha or sachcha kaha hai…

  2. सितम्बर 14, 2008 at 12:07 पूर्वाह्न

    दिल की गहराई से उठते जज्बात!!

  3. kmuskan said,

    सितम्बर 16, 2008 at 12:10 अपराह्न

    बहुत खुबसूरत ………………दिल को छूने वाली पंक्तिया

  4. Rewa Smriti said,

    सितम्बर 23, 2008 at 2:13 अपराह्न

    हौलेसे बिन बुलाए मेहमान की तरह रूक जाती है
    कभी कुछ कहती है , कभी यूही खामोशी से रहती है

    lahron ki tarah hoti hai ye zazbaat


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