बेटी

बेटी तू हमारी लाडली बस कहने को कहते है सभी

सोने के पिंजरे में रहती हूँमेरी भावनाए दबी

पंख दिए है उड़ने के लिए

मगर आज़ादी देना भूल गये

मैं भी गगन में विहार कर सकती हूँ

एक विश्वास जताना भूल गये

मुझे भी जाने दो अपना जहाँ खुद बना लूँगी 

वादा करती हूँ कामयाब लौट के उंगी

थोड़ी कोशिश करने दो ,हार और जीत देखनी है 

दुनिया के तजुर्बे सीखने है

बस एक मौका चाहिए ,देंगे ना …… 

 

6 टिप्पणियाँ

  1. सितम्बर 28, 2008 at 3:34 अपराह्न

    पंख दिए है उड़ने के लिए

    मगर आज़ादी देना भूल गये

    मैं भी गगन में विहार कर सकती हूँ

    एक विश्वास जताना भूल गये

    बहुत सुन्दर भाव. सुन्दर रचना.

  2. parul said,

    सितम्बर 28, 2008 at 4:26 अपराह्न

    bahut acchhi baat kahi hai MEHEK …

  3. सितम्बर 28, 2008 at 5:21 अपराह्न

    बहुत सुन्दर-एक विश्वास!! वाह!!

  4. Rewa Smriti said,

    सितम्बर 28, 2008 at 5:37 अपराह्न

    दुनिया के तजुर्बे सीखने है
    बस एक मौका चाहिए ,देंगे ना ……

    Bahut achhi lagi, koun dega ye mouka?

  5. Dr Anurag said,

    सितम्बर 29, 2008 at 7:40 पूर्वाह्न

    खरी बात …

  6. rashmi prabha said,

    सितम्बर 29, 2008 at 11:33 पूर्वाह्न

    bahut saralta se beti ka dard ubhaara
    bahut achha likha hai


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