वक़्त के निशान

समेट कर  , सहेज कर रखे 
वक़्त के निशान थे जो
मखमल के टुकड़े में लपेट कर मलमल का धागा बाँध
कही भूल आई थीआज अचानक उनसे मुलाकात हुई
आँखों में पहचान की झलक थी
होठों पर सिले अजनबी एहसास के ताले भी
वो लम्हे कभी हमारी जान थे,उन में ही हम जीते
उन लम्हों से बातें करते ,जुड़ गये जनम के रिश्ते
वो हमारे अस्तित्व का प्रमाण,आज बन गये नादान
अपने भी थे वो,पराए से भी लगे थोड़े से
लबों की कोरो से मुस्कुराते देखा हमने उन्हे
छू ना पाए तो क्या , महसूस  किया
चल दिए फिर यूही मिलने का ख्वाब लिए……

8 टिप्पणियाँ

  1. mamta said,

    अक्टूबर 1, 2008 at 5:32 पूर्वाह्न

    समेट कर , सहेज कर रखे
    वक़्त के निशान थे जो
    मखमल के टुकड़े में लपेट कर मलमल का धागा बाँध
    कही भूल आई थी, आज अचानक उनसे मुलाकात हुई

    क्या बात है ।बहुत सुंदर अंदाज है आपका ।
    वैसे आज बड़े दिन बाद देखा आपको।

  2. Rewa Smriti said,

    अक्टूबर 1, 2008 at 5:59 पूर्वाह्न

    Aur sath mein ye gana….chalo ek baar fir se ajnabi ban jaye hamdono….😦

  3. Dr Anurag said,

    अक्टूबर 1, 2008 at 6:28 पूर्वाह्न

    rewa ji theek kah rahi hai dr sahab.

  4. रौशन said,

    अक्टूबर 1, 2008 at 6:39 पूर्वाह्न

    कविता पढ़ के गुलज़ार की याद हो आई
    उसी तरह से खूबसूरती से बयां और उसी तरह से भावनाओं पर पकड़
    बहुत सुंदर कविता

  5. rashmi prabha said,

    अक्टूबर 1, 2008 at 7:59 पूर्वाह्न

    waqt ke nishaan se milna,
    romanch ho aaya

  6. pryas said,

    अक्टूबर 1, 2008 at 8:35 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर!!!
    आपका अंदाज़ ही अलग है.

  7. अक्टूबर 1, 2008 at 9:25 पूर्वाह्न

    अपने भी थे वो,पराए से भी लगे थोड़े से
    लबों की कोरो से मुस्कुराते देखा हमने उन्हे
    छू ना पाए तो क्या , महसूस किया
    चल दिए फिर यूही मिलने का ख्वाब लिए……
    बेहतरीन रचना के लिए आपको बधाई

  8. अक्टूबर 1, 2008 at 4:25 अपराह्न

    एक अलग से अंदाज में बेहतरीन कविता!! बधाई!


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