गुमसूम पल

दुनिया की भीड़ में जाने कहाँ खो गये हम
रफ़्ता रफ़्ता चलती ज़िंदगी ना रुकनेवाला पहिया बनी
अंधेरे क्या और क्या उजाले सब सरिके
खुद का वजूद खोजते कही खो गया जैसे
फिर भी एक झरोके की रौशनी
नज़रों के सामने आती है
हमारा अपना वो गुमसूम पल झाकता है
उसके पीछे से , पुकारता है हमे 
आओं ना फिर मिलने एकांत में , जिले वही यादें
जो सिर्फ़ तुम्हारी है तुम्हारी ,हौले से बुलाता है ……

6 टिप्पणियाँ

  1. ranju said,

    अक्टूबर 2, 2008 at 3:58 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर .हैं कहाँ आप आज कल

  2. rachna said,

    अक्टूबर 2, 2008 at 5:44 पूर्वाह्न

    good to see you back in blogging any news to share email me and grreat poem as always

  3. अक्टूबर 2, 2008 at 7:29 अपराह्न

    बहुत सुंदर ..गाँधी जयंति की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

  4. venus kesari said,

    अक्टूबर 2, 2008 at 9:14 अपराह्न

    एक अच्छी कविता पढ़वाने के लिए धन्यवाद
    गजल की क्लास चल रही है आप भी शिरकत कीजिये http://www.subeerin.blogspot.com

    वीनस केसरी

  5. rashmi prabha said,

    अक्टूबर 3, 2008 at 9:40 पूर्वाह्न

    ye gumsum pal………… !
    bahut hi arthbhae,namee ki dastaan liye

  6. Rewa Smriti said,

    अक्टूबर 3, 2008 at 2:38 अपराह्न

    हमारा अपना वो गुमसूम पल झाकता है
    उसके पीछे से , पुकारता है हमे

    per wo pal wapas aaye tab to kuch baat bane….😦


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