एहसासों के समंदर में

एहसासों के समंदर में
उठती है विचारों की ल़हेरें
कभी मदमस्त बहती मंद मुस्काती
कभी रौद्र रूप ले कुछ कहती
तूफ़ानो के बवंडर में सुनाई नही देता
चिंतन , योग के किनारे पहरा देते है
उन्हे निगलकर , सब बंधन तोड़
उन्मुक्त सी निकल जाती है दिशाहीन
और बह जाते है हम भी 
साथ उनके बिन बुलाए ही….

3 टिप्पणियाँ

  1. अक्टूबर 4, 2008 at 3:07 अपराह्न

    एहसासों के समंदर में
    उठती है विचारों की ल़हेरें
    कभी मदमस्त बहती मंद मुस्काती
    कभी रौद्र रूप ले कुछ कहती
    तूफ़ानो के बवंडर में सुनाई नही देता
    bahut sunder

  2. अक्टूबर 4, 2008 at 10:23 अपराह्न

    और बह जाते है हम भी
    साथ उनके बिन बुलाए ही….

    –बहुत खूबसूरत!!! वाह!!

  3. विनय said,

    अक्टूबर 5, 2008 at 8:52 पूर्वाह्न

    rudra roop mein vichaar ka uthana, kamaal kii soch hai|


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