नसीब की पगडंडी

यादों के झूलों पर झूलते हुए आज
ढूँढ रही हूँ प्यार के वो बिखरे हुए साज़
रिश्तों की गठरी है आज मेरे पास
संभाल कर रखे है पुराने संस्कारों के पाश |

अब तक मन में खिली है गुलमोहर की बहार
बसा है कन कन में उसका खुश्बू भरा प्यार
नीली नदिया के किनारे मन के पग थम जाए
जहाँ रुका हर शक्स अपनासा बन जाए |

याद है मुझे प्रेम का हरा गलीचा बुना हुआ
मुलायम रेशमी तागॉ से रिश्तों में पिरोया हुआ
एक दिन मैं वापस लौटकर वहीं आउंगी
प्यार की पल्लवी अपने साथ लेकर जाउंगी |

ज़िंदगी की राहों में बहुत आगे निकल आई हूँ
अपने लोगों में रहते हुए ,पराई सी हुई हूँ
विदा लेती हूँ सबसे ,बहुत बाकी है चलना राह-ए-गुजर
देखना है कहा ले जाए,नसीब की पगडंडी का सफ़र. |

3 टिप्पणियाँ

  1. Rajesh said,

    अक्टूबर 5, 2008 at 9:16 पूर्वाह्न

    Bahut Baaki Hai Chalna Raah-E-Guzar….

    Nice. Well said.

  2. अक्टूबर 5, 2008 at 2:44 अपराह्न

    ज़िंदगी की राहों में बहुत आगे निकल आई हूँ
    अपने लोगों में रहते हुए ,पराई सी हुई हूँ
    विदा लेती हूँ सबसे ,बहुत बाकी है चलना राह-ए-गुजर
    देखना है कहा ले जाए,नसीब की पगडंडी का सफ़र. |

    –सटीक रचना, शुभकामनाऐं. जो नसीब मे हो.

  3. Rewa Smriti said,

    अक्टूबर 18, 2008 at 7:55 अपराह्न

    दो शब्द मेरे तरफ से-

    इन पगडंडियों से मैं भी कभी गुज़री थी
    वो भी एक वक़्त था जो हाथों से फिसल गया.


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: