अजनबी मुस्कान

कुछ पुराना सा वाकीया है,बहुत पुराना भी नही  या  साल पहले का होगा | जब हम
और हमारी दो सहेलियाँ मुंबई के एक सात सितारा होटेल में कान्फरेन्स के लिए गयी थी |
कान्फरेन्स तो बस बहाना था,ज़्यादा खुशी सात सितारा होटेल में जाने मिलेगा इस बात की थी ,
वो भी सात मंज़िला | एसा नही के हमारे शहर में अच्छे फाइव स्टार होटेल नही,मगर उतने उँचे 
नही,और समंदर किनारे तो बिल्कुल :):)  नही |

     जब हम तीनो वहा पहुँचे ,होटेल का नज़ारा बाहर से इतना खुबुसूरत था  , छोटी जगह में
करीने से लगाए हरे भरे पेड़ ,सुंदर नकाशी ,छोटी सी जगह में इतनी सलीके से बनाई पार्किंग की 
सुविधा | पास से आती समंदर के ल़हेरो की गुंजन और हवायें | जब अंदर दाखिल हुए लगा किसी
महाराजा के रजवाड़े तो नही  गये | इतनी भव्य सजावट ,शायद खास कान्फरेन्स के लिए की गयी थी |
 
जैसे की हर कान्फरेन्स में होता है , लेक्चर सुनने कम और खाने में ज़्यादा रूचि रखने वाले हम
जैसे लोग , सीधा ब्रेकफास्ट टेबल की और चल देते है: :):) हम भी सबसे पहले उधर को निकल गये |
 
     
दुल्हनी गुलाबी और लाल रंग के पर्दों से सजे बड़े से हॉल में , महेंगी क्रॉकरिमें रखे अनेको 
पकवान ,बफ़े सिस्टम था , प्लेट हाथो में लेने से मन काप गया,कही गिरके टूटी तो ना जाने कितना 
हर्जाना भरना पड़े | हिम्मत करके उठा ली , पहले तू पहले तू करते हुए | ना जाने सब बड़े बड़े लोगो के बीच 
हम तीनो खुद को  छोटा  क्यूँ  महसूस कर रही थी,शायद थोड़े छोटे शहर से थे इसलिए , या कोई हमारी 
हरकते देख हसी ना बना दे इसलिए,या बस इतने बड़े होटेल में जाने की पहली बारी थी इसलिए मन में
कुछ डर सा था | इतने बड़े हॉल में चार सौ  लोगो के बीच हमे अजनबी सा लग रहा था | काम कितना छोटा
था , प्लेट भर के लेना और नाश्ता करना , मगर वो भी ना हो पा रहा | खुद पे हँसी भी रही थी |

                किसी कोने से उसकी निगाहों ने हमारी उधेड़बुन समझ ली | एक २० से २२ साल का लड़का,
कड़क इस्त्री की हुई यूनिफॉर्म और उसके साथ पहनी थी होठोंके कोरो तक से बाहर निकलती सजीव
सी मुस्कान | हाथों में ट्रे लिए हमारी और ही रहा था |  ” मैं आप सब की प्लेट्स भरवा कर ले आता हूँ,
आप लोग साइड टेबल्स पर बैठ जाइएगाकहते हुए वो प्लेट्स लिए निकल लिया | हमारा नाश्ता
जब तक ख़तम नही हुआ वो साइड में काम करते हुए भी हमे लगनेवाली हर चीज़ का ध्यान रखे था |
अचानक हम तीनो को हमलॉग कोई वी .आय.पी. मेहमान से लगने लगे थे | पूरे तीन दिन की कान्फरेन्स
में उसने हमारा बहुत ख़याल रखा,चाहे लंच हो या डिनर टाइम या सिर्फ़ चाय का ब्रेक |

          वैसे था तो वो वहा काम करनेवाला वेटर , मगर उसकी वो अपनेपन से भरी मुस्कान और बहुत
चाव और प्यार से खाना खिलाने का सलीका हमारे दिलों को कही छू गया | वही एक मुस्कान ने
हमारे दिल से अजनबी एहसास भगा दिया था | बातें करते समय पता चला के
वो अकेला कमानेवाला और खानेवाले बहुत से लोग थे उसके घर में | मा का दिल की बीमारी इलाज भी
करा रहा था | परेशानिया तो कोई कम नही थी उसको भी, मगर कही कोई लकीर नही चहेरे पर | जिसके
ज़िंदगी में सच में कुछ बोझ थे वो हसके उन्हे सुलझा रहा था  और हमारे ज़िंदगी में कोई बोझ ना होकर
भी हम झुक के चल रहे  होते हैना जाने कभी कभी वो मुस्कान यूही आँखों के सामने  जाती है और
संग बरबस एक मुस्कान हमारे झोली में डाल देती है |
   
           
भीड़ में खुद को तन्हा समझ बैठे थे हम यारों
          
वो अजनबी मुस्कान हमारी पहेचान बना गयी |

                     

                      

 

5 टिप्पणियाँ

  1. makrand said,

    अक्टूबर 11, 2008 at 4:22 अपराह्न

    bahut sunder lekh
    regards

  2. अक्टूबर 11, 2008 at 4:44 अपराह्न

    बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो अपना गम किसी को न बता कर दूसरे को सहयोग देते हैं ! और दूसरे भी ऐसे हैं जो अपना सुख लेकर, इससे कोई मतलब नही रखते कि सहयोगी का भी कोई दर्द है या नहीं !

  3. अक्टूबर 11, 2008 at 8:03 अपराह्न

    बहुत ही अच्छा लगा यह सब पढ कर.

  4. rashmi prabha said,

    अक्टूबर 13, 2008 at 6:44 पूर्वाह्न

    भीड़ में खुद को तन्हा समझ बैठे थे हम यारों
    वो अजनबी मुस्कान हमारी पहेचान बना गयी |
    सच में कुछ मुस्कान मन के कैनवास में चित्रित हो जाती हैं,
    बहुत सुन्दर भावनाएं हैं इस घटना में

  5. Rewa Smriti said,

    अक्टूबर 16, 2008 at 2:56 अपराह्न

    Achhi lagi.

    Bheed mein bhi tanha nazar aate hein😦


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