ए ज़िंदगी

ज़िंदगी

सुबह तड़के
ठंड में सिकुडती बाहें
हाथों में दूध की बोतले लिए
हर दरवाज़े पर दस्तक देती
घूमती है ज़िंदगी
ताकि गहरी नींद में सोनेवालों
को जगाने के लिए
एक प्याला चाय बन सके

स्टेशन के प्लॅटफॉर्म पर
हाथो में ब्रश और कपड़ा लिए
आँखों में आधी नींद भरी
मुख पर थोड़ा काला पोलिश बिखेर
बैठ जाती है ज़िंदगी
और इंतज़ार करती है
किसी सफेद पॉश के जुते साफ़ हो
और मेरे घर का चूल्हा जले

ट्रॅफिक सिग्नल पर
होठों पे मुस्कान
और आँखों में आस लिए
अख़बार  बेचती हुई
भागती है ज़िंदगी
गाडोयोँ के पीछे

खुद की परवाह किए बिना
सोचती है मिर्च मसाला खबर बिके
और उसके घर में तेल आए
तो वो भी कुछ पढ़ सके
दिये के नीचे…..

8 टिप्पणियाँ

  1. ranju said,

    अक्टूबर 15, 2008 at 3:09 अपराह्न

    भावपूर्ण सच्चाई लिखी है आपने ..

    भागती है ज़िंदगी
    गाडोयोँ के पीछे
    खुद की परवाह किए बिना
    सोचती है मिर्च मसाला खबर बिके
    और उसके घर में तेल आए
    तो वो भी कुछ पढ़ सके
    दिये के नीचे…..

  2. MEET said,

    अक्टूबर 16, 2008 at 12:20 पूर्वाह्न

    Badhiya hai. Bahut acchha lagaa.

  3. parul said,

    अक्टूबर 16, 2008 at 4:45 पूर्वाह्न

    स्टेशन के प्लॅटफॉर्म पर
    हाथो में ब्रश और कपड़ा लिए
    आँखों में आधी नींद भरी
    मुख पर थोड़ा काला पोलिश बिखेर
    बैठ जाती है ज़िंदगी..sach…

  4. Rewa Smriti said,

    अक्टूबर 16, 2008 at 2:39 अपराह्न

    स्टेशन के प्लॅटफॉर्म पर
    हाथो में ब्रश और कपड़ा लिए
    आँखों में आधी नींद भरी
    मुख पर थोड़ा काला पोलिश बिखेर
    बैठ जाती है ज़िंदगी
    और इंतज़ार करती है
    किसी सफेद पॉश के जुते साफ़ हो
    और मेरे घर का चूल्हा जले

    Bahut gahri baat kahi hai….Kash sabke ghar mein dono sham chulha jal pata….isliye kahti hun ye zindagi ye lamha filhal jee lene de.

  5. अक्टूबर 17, 2008 at 12:36 पूर्वाह्न

    बाँटी है जिसने तीरगी उसकी है बंदगी।
    हर रोज नयी बात सिखाती है जिन्दगी।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    http://www.manoramsuman.blogspot.com

  6. Dr Anurag said,

    अक्टूबर 17, 2008 at 9:02 पूर्वाह्न

    सच में कभी कभी कितनी अजनबी सी लगती है न ये जिंदगी !

  7. विनय said,

    अक्टूबर 17, 2008 at 1:15 अपराह्न

    सचमुच यथार्थ के अतिरिक्त कुछ नहीं आपकी कविता।

  8. komal thakre said,

    फ़रवरी 18, 2014 at 8:18 पूर्वाह्न

    ye jindgi ki sacchai h
    isse hm muh nhi mod skte


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: