आधा चाँद

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तुम हमे आज कल वैसे ही अच्छे लगते हो
आधे अधूरे ,
हम तुम में अपनी भावनाए भर दे
और तुम हम में जज़्बात भरो
ताकि कुछ लेन देन होता रहे
तुझ में और हम में जुड़े रहने के लिए
इसीलिए पूनम की चका चौंध रौशनी से
ज़्यादा कुछ रीता कुछ खाली सा
आधा चाँद ही भाता है मन को
आसमान से छन छन कर आती उसकी किरने
सहेला देती है दिल के उस कोने को रोज रोज
साथ देती है हर रात,
जहा तुम रहते हो…..

7 टिप्पणियाँ

  1. ranju said,

    नवम्बर 4, 2008 at 4:49 पूर्वाह्न

    बहुत खूब बढ़िया लिखा है

  2. Dr Anurag said,

    नवम्बर 4, 2008 at 7:47 पूर्वाह्न

    हाय कितना खूबसूरत होता है न आधा चाँद

  3. mehek said,

    नवम्बर 4, 2008 at 1:36 अपराह्न

    shukran

  4. नवम्बर 4, 2008 at 4:40 अपराह्न

    बहुत ही सुंदर है आप का यह चांद…

  5. Rewa Smriti said,

    नवम्बर 4, 2008 at 4:57 अपराह्न

    Mehek, hmmm adha chand! Chalo kisi ne to yaad kiya ise. Tumhare poem ko padhkar ek gana yaad aa gayi…kabhi waqt mile to sunna🙂

    Aadha hai chandrama raat aadhi
    Reh na jaye teri meri baat aadhi, mulaqat aadhi….

  6. नवम्बर 5, 2008 at 12:43 पूर्वाह्न

    बहुत सुन्दर और नाजुक रचना. बधाई.

  7. रमेश पिँडयार said,

    नवम्बर 7, 2008 at 3:22 अपराह्न

    शब्दोँ का तालमेल शानदार है


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