किस मिट्टी की रची है

अकसर हमे उसके शांत दिल का राज समझ नही आता
कैसे कर लेती है सब कुछ,चाहे कोई कितनी भी फरमाइश करे
सब की मुरादे पूरी करती है,खुद का भी ख़याल केरती है
किसी से बदले में कुछ अपेक्षा नही करती,नही कुछ मांगती है
कोई उसपर झल्लाता है,कोई खाने में जान बुझ नुक्स निकालता है
फिर भी मुस्कुराके ग़लती हो गयी कहती है
पूरा घर और ऑफीस संभालकर , सारे घरवालों का नखरा सहकर
डबल काम कर के , थोडासा ही आराम मिलता है उसे
ना जाने ये मा किस मिट्टी की रची है भगवान ने
हम कभी नही समझे…..

11 टिप्पणियाँ

  1. नवम्बर 5, 2008 at 3:24 पूर्वाह्न

    ना जाने ये मा किस मिट्टी की रची है भगवान ने…
    हम कभी नही समझे…..

    umda likha hai

  2. Dr Anurag said,

    नवम्बर 5, 2008 at 6:12 पूर्वाह्न

    तभी तो वो मां है !

  3. Rewa Smriti said,

    नवम्बर 5, 2008 at 6:13 पूर्वाह्न

    Duniya mein maan ki mamta se badhkar kuch bhi nahi hota hai.

  4. ranju said,

    नवम्बर 5, 2008 at 6:51 पूर्वाह्न

    माँ ऐसी ही होती है

  5. alpana said,

    नवम्बर 5, 2008 at 8:03 पूर्वाह्न

    maa se badhkar kaun ho sakta hai…itni sahansheel!

    [kaisee ho Mahak?]

  6. नवम्बर 5, 2008 at 10:19 पूर्वाह्न

    माँ तो बस ऐसी ही रची गई है सबकी. बहुत सुन्दर रचना.

  7. नवम्बर 5, 2008 at 1:39 अपराह्न

    मिट्टी तो वही है। पर अपनी रचना पर सभी न्योछावर होते हैं।

  8. Shubhashish Pandey said,

    नवम्बर 5, 2008 at 3:31 अपराह्न

    bhav dil ko choo gaye

  9. नवम्बर 5, 2008 at 5:30 अपराह्न

    यह सिर्फ़ मां ही हो सकती है, जो सब कुछ सहन करती है, ओर चेहरे पर कभी भी शिकायत नही लाती, सभी गलतिया भी माफ़ करती है… वो है मां सच मै पता नही किस मिठ्ठी की बनी है??
    धन्यवाद

  10. akshaya-mann said,

    नवम्बर 6, 2008 at 4:13 पूर्वाह्न

    bahut hi marmik rachna…..

  11. menka said,

    नवम्बर 6, 2008 at 3:32 अपराह्न

    awesome….


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