मन की आशायें

मन की आशायें भी
बड़ी अजीब होती है
शाम ढलते ही नीम तले
जाकर खड़ी हो गई
सोचती है गर टहनी टूटी तो
उसपर बैठा चाँद
उनकी झोली में गिरेगा |

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कल हमने चाँद को देखा
बादलों की चादर से झाकता ,मुस्काता
,फिर छुप जाता
बार बार यही हरकत दोहराता
शाम ढल रही थी वही
सूरज डूब रहा  था दूसरे छोर
निशा की पायल खनकी
मगर वो शरारती बाज ना आया
हमसा ही कह रहा था
सोने दो ना और पाँच मिनिट बाकी है
रात होने में अभी….

12 टिप्पणियाँ

  1. arsh said,

    नवम्बर 13, 2008 at 5:37 अपराह्न

    bahot badhiya duya karunga tahani tute aur wo chand aapke jholi me gir jaye.. bahot hi badhiya .. makhmali andaj me sajaya apne … aapko dhero badhai..

  2. sandeep said,

    नवम्बर 13, 2008 at 5:41 अपराह्न

    अगर टहनी टूटी भी, तो भी चाँद झोली में नहीं गिरेगा, क्योंकि चाँद तो कंप्यूटर के सामने कमेन्ट पढ़ रहा होगा, हा हा हा….

    सॉरी- इसे कमेन्ट के लिए…
    बेहद उम्दा लाइनें ……

  3. Rewa Smriti said,

    नवम्बर 13, 2008 at 6:49 अपराह्न

    सोचती है गर टहनी टूटी तो
    उसपर बैठा चाँद
    उनकी झोली में गिरेगा |

    Mehek, ham bachpan mein bhi to aisa hi sochte the…aur ab bhi kabhi kabhi bahar baith chand per taktaki lagaye baaten kar lete hein. Shayad…kabhi hamare paas aa jaye🙂

  4. Rewa Smriti said,

    नवम्बर 13, 2008 at 6:50 अपराह्न

    निशा की पायल खनकी
    मगर वो शरारती बाज ना आया

    Ahha…beautiful lines!

  5. नवम्बर 13, 2008 at 7:32 अपराह्न

    बहुत ही सुंदर, आप ने बचपन याद दिला दिया, बचपन मै चारपाई पर सीधे लेट कर चांद को देखना, लगता था यह चांद भाग रहा है, लेकिन इतनी अकल नही थी की यह बादल उड रहै है, कभी मां से तो कभी पापा से डांट पडती थी, इस चांद के पीछे.
    धन्यवाद,

  6. sameerlal said,

    नवम्बर 13, 2008 at 8:20 अपराह्न

    वाह! बहुत सुन्दर.

  7. Rajeev K Nidhi said,

    नवम्बर 14, 2008 at 7:42 पूर्वाह्न

    gazal likha karen….waise prayaas achchi hai

  8. विनय said,

    नवम्बर 14, 2008 at 8:51 पूर्वाह्न

    मन की आशाएँ, नीम का पेड़ और चाँद, सब एक साथ, क्या बात है!

  9. shobha said,

    नवम्बर 14, 2008 at 1:11 अपराह्न

    मन की आशायें भी
    बड़ी अजीब होती है
    शाम ढलते ही नीम तले
    जाकर खड़ी हो गई
    सोचती है गर टहनी टूटी तो
    उसपर बैठा चाँद
    उनकी झोली में गिरेगा |
    सच ही कहा है। मन की आशाएँ ऐसी ही होती हैं। सस्नेह

  10. नवम्बर 14, 2008 at 4:48 अपराह्न

    …..सोचती है गर टहनी टूटी तो उस पर बैठा चाँद उनकी झोली में गिरेगा …..

    gud one…. wenever i think its ur best… u surprise me with new one…🙂 carry on

  11. akshaya-mann said,

    नवम्बर 15, 2008 at 6:29 पूर्वाह्न

    sundar kalpna………….
    ek jivant rachna………..
    aapka swagat hai….
    “बदले-बदले से कुछ पहलू”
    http://akshaya-mann-vijay.blogspot.com/

  12. Shama said,

    नवम्बर 16, 2008 at 8:35 पूर्वाह्न

    Aah ! Kya kalpana hai…chandkaa jholeeme gir jaana !
    Mere blogpe maine bachpankaa ek qissa likha hai,” Ladder to The Moon”…mai 3/4 saal kee rahee hungee tabkee kalpana…mujhe lagta tha ek lambee seedhee, kisee badalke mauzoom tukdepe tikake chanpe chadha jaa sakta hai…wahan jo budhiya rangbhare badalon mese kapda buntee hai aur neeche fenktee hai…jise leke maa mere froks siltee hai…us budhiyase mila jaa sakta hai….use apne pasand ke badal ke tukde diye jaa sakte hain…roz aisa ek mauzom tukdaa mai dhoondtee rahtee..na jaane kabtak ye silsilaa chala…
    English me hai..zaroor padhiyega……saathee ” Simba” karke ek yaad hai…mujhe yaqeen hai, ye dono aapkee aankhon me sapne aur aansoo dono bhar denge !


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