फ़ितरत

इस बात की खुशी है के बोम्बे ने अपने उपर हुए हमले का डटकर जवाब दिया, मुकाबला किया | हमेशा की तरह एक जुट होकर आंतकवाद का राक्षस मार गिराया | शायद अभी भी पूरी तरह से संभली नही मुंबई ,कही और छुटपुट फाइरिंग जारी है | शहीदों को कभी भुलाया नही जा सकता |जो इस हादसे में फसे रहे कभी भूलेंगे नही ये समा , ये मंज़र | जो बच गये वो खुश नसीब | जो घायल है उन्हे भगवान जल्दी ठीक करें | जिस्म के घाव भर आएँगे मगर मन पे हुआ आतंक शायद जीवन भर सपनो मेनआता रहे उनके ,न आए यही दुआ भी | सराहना करनी होगी लोगो के हौसले की और उन लश्कर जवानो की और पोलीस कर्मीयो की जिन्होने जंग लढी |

इधर हाल ये है के आज शाम घूमने निकले तो कई निगाहे हमे घूर रही थी | लोग कुछ बड़बड़ा रहे थे | कानाफूसी भी हुई | हमे देख सब कहते,आरे यही है वो | हमे तो कुछ समझ न आए उनकी बात | वो भी उपर से तमाशा देख हसता है | तकरार न करे तो क्या करे |

 

चांद तेरे चर्चे आजकल

बहुत होने लगे हर कुचे में

इल्ज़ाम-ए-बदनामी तेरी

हमारे दामन लगाई है

यू बादलों में आवारा घूमने

की फ़ितरत

हमारी तो न रही कभी ……

4 टिप्पणियाँ

  1. mehek said,

    नवम्बर 28, 2008 at 5:50 अपराह्न

    socha tha yu kuch alag si post dalu aur hadsa hul jayenge,magar kuch aawaze picha nahi chodti,kuch asar ab bhi baki hai shayad.

  2. नवम्बर 28, 2008 at 5:52 अपराह्न

    यह शोक का दिन नहीं,
    यह आक्रोश का दिन भी नहीं है।
    यह युद्ध का आरंभ है,
    भारत और भारत-वासियों के विरुद्ध
    हमला हुआ है।
    समूचा भारत और भारत-वासी
    हमलावरों के विरुद्ध
    युद्ध पर हैं।
    तब तक युद्ध पर हैं,
    जब तक आतंकवाद के विरुद्ध
    हासिल नहीं कर ली जाती
    अंतिम विजय ।
    जब युद्ध होता है
    तब ड्यूटी पर होता है
    पूरा देश ।
    ड्यूटी में होता है
    न कोई शोक और
    न ही कोई हर्ष।
    बस होता है अहसास
    अपने कर्तव्य का।
    यह कोई भावनात्मक बात नहीं है,
    वास्तविकता है।
    देश का एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री,
    एक कवि, एक चित्रकार,
    एक संवेदनशील व्यक्तित्व
    विश्वनाथ प्रताप सिंह चला गया
    लेकिन कहीं कोई शोक नही,
    हम नहीं मना सकते शोक
    कोई भी शोक
    हम युद्ध पर हैं,
    हम ड्यूटी पर हैं।
    युद्ध में कोई हिन्दू नहीं है,
    कोई मुसलमान नहीं है,
    कोई मराठी, राजस्थानी,
    बिहारी, तमिल या तेलुगू नहीं है।
    हमारे अंदर बसे इन सभी
    सज्जनों/दुर्जनों को
    कत्ल कर दिया गया है।
    हमें वक्त नहीं है
    शोक का।
    हम सिर्फ भारतीय हैं, और
    युद्ध के मोर्चे पर हैं
    तब तक हैं जब तक
    विजय प्राप्त नहीं कर लेते
    आतंकवाद पर।
    एक बार जीत लें, युद्ध
    विजय प्राप्त कर लें
    शत्रु पर।
    फिर देखेंगे
    कौन बचा है? और
    खेत रहा है कौन ?
    कौन कौन इस बीच
    कभी न आने के लिए चला गया
    जीवन यात्रा छोड़ कर।
    हम तभी याद करेंगे
    हमारे शहीदों को,
    हम तभी याद करेंगे
    अपने बिछुड़ों को।
    तभी मना लेंगे हम शोक,
    एक साथ
    विजय की खुशी के साथ।
    याद रहे एक भी आंसू
    छलके नहीं आँख से, तब तक
    जब तक जारी है युद्ध।
    आंसू जो गिरा एक भी, तो
    शत्रु समझेगा, कमजोर हैं हम।
    इसे कविता न समझें
    यह कविता नहीं,
    बयान है युद्ध की घोषणा का
    युद्ध में कविता नहीं होती।
    चिपकाया जाए इसे
    हर चौराहा, नुक्कड़ पर
    मोहल्ला और हर खंबे पर
    हर ब्लाग पर
    हर एक ब्लाग पर।
    – कविता वाचक्नवी
    साभार इस कविता को इस निवेदन के साथ कि मान्धाता सिंह के इन विचारों को आप भी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचकर ब्लॉग की एकता को देश की एकता बना दे.

  3. विवेक सिंह said,

    नवम्बर 29, 2008 at 9:43 पूर्वाह्न

    शहीदों को सलाम !

  4. नवम्बर 29, 2008 at 1:43 अपराह्न

    पत्थर के खुदा वहाँ भी पाये, हम चाँद से आज लौट आए|

    जंगल की हवाएं आ रही हैं, कागज़ का ये शहर उड़ न जाए|


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