यूही शाम ढलते

यूही शाम ढलते तेरा चुपके से आना

परदे के पीछे खड़ी होकर मासूम मुस्कुराना

 

चाय का लुत्फ़ लेता अख़बार में खोया मैं

हवाओ संग लफ़्ज़ों का कानो में गुनगुनाना

 

हक़ीक़त थी तुम कभी,आज वक़्त का साया हो

याद बहुत आए तेरा दिल पे दस्तक दे जाना

20 टिप्पणियाँ

  1. जनवरी 20, 2009 at 10:45 पूर्वाह्न

    hakeekat thi tum kbhi aaj vakt kaa saya ho yaad bahut aaye tere dil pe dastak de jaanaa bahut sundar hai

  2. shobha said,

    जनवरी 20, 2009 at 10:49 पूर्वाह्न

    यूही शाम ढलते तेरा चुपके से आना

    परदे के पीछे खड़ी होकर मासूम मुस्कुराना
    बहुत सुन्दर लिखा है।

  3. Shashwat said,

    जनवरी 20, 2009 at 11:14 पूर्वाह्न

    हक़ीक़त थी तुम कभी,आज वक़्त का साया हो

    Dil le gayin ye panktiyaan.

  4. ranju said,

    जनवरी 20, 2009 at 11:36 पूर्वाह्न

    हक़ीक़त थी तुम कभी,आज वक़्त का साया हो

    बहुत बढ़िया लगी यह रचना

  5. जनवरी 20, 2009 at 12:49 अपराह्न

    क्या खूब>>..

  6. जनवरी 20, 2009 at 12:57 अपराह्न

    यूही शाम ढलते तेरा चुपके से आना
    परदे के पीछे खड़ी होकर मासूम मुस्कुराना

    खूबसूरत शेर……………ये तो खास कर खुशबू सी भर गया

  7. alpana verma said,

    जनवरी 20, 2009 at 12:57 अपराह्न

    हक़ीक़त थी तुम कभी,आज वक़्त का साया हो
    याद बहुत आए तेरा दिल पे दस्तक दे जाना

    yaden hi to rah jati hain…bahut khuub!
    aaj kal dikhayee nahin detin Mahak?bahut dino mein yah kavita post ki.

  8. Dr Anurag said,

    जनवरी 20, 2009 at 1:11 अपराह्न

    हक़ीक़त थी तुम कभी,आज वक़्त का साया हो

    याद बहुत आए तेरा दिल पे दस्तक दे जाना

    kya baat hai !

  9. विनय said,

    जनवरी 20, 2009 at 2:05 अपराह्न

    vah bhai vah kamaal likha hai

    —आपका हार्दिक स्वागत है
    चाँद, बादल और शाम

  10. rashmi prabha said,

    जनवरी 20, 2009 at 3:06 अपराह्न

    bahut achha likha hai…….

  11. विवेक सिंह said,

    जनवरी 20, 2009 at 3:48 अपराह्न

    बहुत खूब !

  12. Anil Kant said,

    जनवरी 20, 2009 at 4:11 अपराह्न

    bahut khoob….uttam …

  13. जनवरी 20, 2009 at 4:25 अपराह्न

    क्या बात है….ढ़ेर-ढ़ेर वाह

  14. Rewa Smriti said,

    जनवरी 20, 2009 at 5:45 अपराह्न

    हक़ीक़त थी तुम कभी,आज वक़्त का साया हो!

    Bahut khub…tu jahan jahan chalega…mera saya sath hoga🙂

  15. जनवरी 20, 2009 at 5:46 अपराह्न

    वाह क्या बात है, एक सुंदर ख्याल…
    धन्यवाद

  16. संगीता पुरी said,

    जनवरी 20, 2009 at 6:10 अपराह्न

    बहुत सुंदर…क्‍या बात है।

  17. जनवरी 21, 2009 at 8:40 पूर्वाह्न

    बहुत ख़ूब वाह।

  18. swapn said,

    जनवरी 21, 2009 at 1:16 अपराह्न

    bahut khoob chand lafzon men kamaal. swapn

  19. जनवरी 22, 2009 at 3:42 पूर्वाह्न

    Very nice…you are more than welcome to publish your shayris on yourstrulypoetry.com

  20. फ़रवरी 5, 2009 at 3:29 अपराह्न

    आप में बहुत सम्भावना है. प्रशंसाओं पर ध्यान न देकर अपनी अभिव्यक्ति के लिए समुचित शब्द और लय चुनें तो कविता गीति रचना होकर अधिक भावपूर्ण और मधुर हो सकेगी. यह सलाह आपकी रचना को अधिक प्रभावी बनने की द्रष्टि से है अन्यथा न लें. आपकी कुछ पंकितन दुहराकर तारीफ करना आसान है. मैं कडुआ सच कह रहा हूँ न भाये तो भूल जाएँ.


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