तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ

सावन  के पानी में छप छप करना

किसी के मुख मुस्कान वास्ते जानबूझ

 कीचड़ में फिसलना

वो हर्ष के धब्बे  उठे मौजूद है

मन की काँच पर आज भी

 

==============

 

दूर नभ में स्थित हो

मन मचलता है तुम्हे पाने

थाली में पानी सजाकर

तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ

उस में खुद को निहार के

चाँद और हमारा अक्स

ऐसे ही मिला लेती हूँ…..

19 टिप्पणियाँ

  1. rashmi prabha said,

    जनवरी 30, 2009 at 1:33 अपराह्न

    paani me chhap chhap karna…….ek mohak kalpana !
    aur chaand ko paane ka khyaal, bahut sundar……….

  2. जनवरी 30, 2009 at 1:44 अपराह्न

    “मन मचलता है तुम्हे पाने
    थाली में पानी सजाकर
    तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ”

    बहुत सुंदर !1111

    थोडा सा समय मुझे भी दे।
    http://www.govindkprajapat.blogspot.com

    धन्यवाद

  3. ranju said,

    जनवरी 30, 2009 at 2:22 अपराह्न

    दूर नभ में स्थित हो

    मन मचलता है तुम्हे पाने

    थाली में पानी सजाकर

    तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ

    उस में खुद को निहार के

    चाँद और हमारा अक्स

    ऐसे ही मिला लेती हूँ…..

    वाह बहुत सुंदर एहसास

  4. kishore said,

    जनवरी 30, 2009 at 3:10 अपराह्न

    achchi lagi aap ki kavita

  5. alpana verma said,

    जनवरी 30, 2009 at 4:00 अपराह्न

    “मन मचलता है तुम्हे पाने
    थाली में पानी सजाकर
    तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ”

    bahut achchee lagin ye panktiyan.
    bahut sundar!

  6. Pratap said,

    जनवरी 30, 2009 at 4:53 अपराह्न

    प्रेम की कोमल भावना का मोहक चित्र. सुंदर कविता.

  7. जनवरी 30, 2009 at 6:30 अपराह्न

    बहुत अच्छी लगी आपकी कविता महक जी !

  8. जनवरी 30, 2009 at 6:49 अपराह्न

    बहुत सुंदर लिखा है…

  9. जनवरी 30, 2009 at 7:26 अपराह्न

    बहुत सुंदर ढंग से दिल का दर्द आप ने कबिता मे उडेल दिया.
    धन्यवाद

  10. javedusmani said,

    जनवरी 31, 2009 at 9:45 पूर्वाह्न

    aap ke nam ke anurup hee aap kee kavitaa hain . kintu kavitaa me yah spast nahee hain ki pratibimba kisaka hain , jisake lie ,aap ne shabdo kee sugandh bikheree hain .

  11. जनवरी 31, 2009 at 10:06 पूर्वाह्न

    दूर नभ में स्थित हो

    मन मचलता है तुम्हे पाने

    थाली में पानी सजाकर

    तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ

    उस में खुद को निहार के

    चाँद और हमारा अक्स

    ऐसे ही मिला लेती हूँ…..

    अति सुन्दर

  12. जनवरी 31, 2009 at 10:23 पूर्वाह्न

    थाली में पानी सजाकर
    तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ

    बहुत गहरी सोच की उपज है ये हसीन रचना………..सुंदर शब्दों का ताना बना
    बसंत पंचमी की बहुत बहुत बधाई

  13. जनवरी 31, 2009 at 4:03 अपराह्न

    बहुत खूबसूरत लिखा है…किसी की एक मुस्कान की खातिर हम क्या क्या करते हैं. मुहब्बत जिस राह पर ले जाए🙂

  14. kk yadav said,

    फ़रवरी 1, 2009 at 2:47 अपराह्न

    Bahut sundar…!!
    ___________________________________
    युवा शक्ति को समर्पित ब्लॉग http://yuva-jagat.blogspot.com/ पर आयें और देखें कि BHU में गुरुओं के चरण छूने पर क्यों प्रतिबन्ध लगा दिया गया है…आपकी इस बारे में क्या राय है ??

  15. paramjitbali said,

    फ़रवरी 3, 2009 at 7:03 पूर्वाह्न

    बहुत सुन्दर मनोभावों को सजाया है।बहुत सुन्दर लिखा है।

  16. फ़रवरी 3, 2009 at 1:32 अपराह्न

    “मन मचलता है तुम्हे पाने
    थाली में पानी सजाकर
    तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ
    उस में खुद को निहार के
    चाँद और हमारा अक्स
    ऐसे ही मिला लेती हूँ…..

    बहुत सुंदर !

  17. Rewa Smriti said,

    फ़रवरी 4, 2009 at 3:47 अपराह्न

    मन मचलता है तुम्हे पाने
    थाली में पानी सजाकर
    तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ…

    Beautiful expression!
    Have you heared the song “sawan ka mahina pavan kare shor….?”

  18. फ़रवरी 5, 2009 at 3:22 अपराह्न

    रचना का भाव श्रेष्ठ है यदि शिल्प पर ध्यान दें तो सोने में सुहागा होगा. शब्दों को उनके सही अर्थ में उपयोग किया जाना चाहिए. कविता सरस, नीरस, मधुर, अच्छी, बुरी तो हो सकती है पर वह खूबसूरत, बदसूरत, सुंदर, असुंदर, कुरूप कैसे हो सकती है? यह मैं नहीं समझ सका. सुन्दरता आकार का गुण है. कविता में आकार नहीं शब्द होते हैं. कविता की कसौटी काव्य शास्त्र में देखें, सुन्दरता कविता का मानक नहीं है.

  19. preeti tailor said,

    फ़रवरी 11, 2009 at 10:37 पूर्वाह्न

    aur tumhare gile se sile se ehsaas ko padhkar apna man bhigo leti hun..


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