मन

मन आज बहुत उदास था | बहुत सी उथल पुथल अपने अन्दर समाये ,वो युही चलता जा रहा था |
कुछ भी तो सरल नही आसपास , और गर कुछ सरल रहता ,तब वह सोचता करने को कुछ भी नही है |
चलते हुए उसके कदम बगीचे में जा रुके | एक बेंच पर जाके बैठ गया | उसे दुनिया की कोई सुधबुध न थी |
कुछ देर बाद कही से नन्ही सी लड़की आके मन के बगल में बैठ गई |
मन को मायूस देख उसने पुछा ” क्यूँ उदास हो ?”
” मैं नाराज हूँ ज़िन्दगी से ,कुछ भी तो जैसा मैं चाहू वैसा नही होता ” मन कह गया |

” अच्छा चलो एक खेल खेलते है ,वो देखो फूलों की क्यारिया ,और उनपर प्यारी तितलिया ,
एक नज़र उन्हें देखो और अपनी ऑंखें बंद कर लो ,तभी खोलना जब मैं कहूँ ” नन्ही |
मन ने वैसे ही किया जैसा की नन्ही ने कहा | जब नन्ही के कहने पर उसने आंखें खोली ,वह कुछ
मुस्कुरा रहा था |
नन्ही ने पुछा ” क्यूँ मुस्कुरा रहे हो ”
“पहले फूलों पर तितलियाँ थी ,अब उड़ गई ,कितने खुबसूरत फूल है ना” मन |
नन्ही बोली ” मन ,नाराजगियां भी इन तितलियों सी होती है,कुछ देर आके रूकती उड़ जाती है,
और मुस्कान इन फूलों की तरह हमेशा हमें प्रसन्न महसूस कराती है ” |

मन की मुस्कान कुछ हद तक खिलखिलाहट में तपदिल हो चुकी थी |
नन्ही ने फिर पुछा ” अच्छा बताओ तुम ज़िन्दगी से नाराज क्यूँ हो?”
” क्यूँ की वो हमेशा शतरंज की तरह नई नई बिसाद खेलती है मेरे साथ | मेरे और उसके ख्याल
कभी नही मिलते | जो मैं चाहूं उसका उल्टा करती है वो | अपने सफ़ेद और काले से चौकोन
में दौडाती रहती है ” मन ने अपनी बात कह दी |

” लेकिन ये खेल खेलकर ही तो तुम्हे हार और फिर जीत का नशा मिलता है | जैसे दिन और रात
सत्य है,वैसे ही ज़िन्दगी के सफद और काले रंग भी सत्य है | बजाय के ज़िन्दगी को शंतरंग मानों,
मैं ज़िन्दगी को एक पियानो की तरह समझती हूँ ,जिस में भी सफ़ेद – काली चिपिया है,मगर चाहे
जो भी चिपी दबाओ संगीत ही बजता है | अब धुन खुशी की है या उदासी की ये तो बजानेवाले पर
निर्भर करता है ” नन्ही एक साँस में बहुत कुछ कह गई |

मन कुछ हल्का महसूस कर रहा था ,बोला ” बात तो तुम समझदारी की कर गई | इतनी छोटी होकर
भी ज्ञान बहुत है तुम्हे |
” हां मेरी उमर बहुत छोटी है ,मगर समझ से गुजारो बड़ी अनमोल है “| नन्ही

” कौन हो तुम?”
” ज़िन्दगी ”

12 टिप्पणियाँ

  1. ranju said,

    फ़रवरी 18, 2009 at 11:14 पूर्वाह्न

    महक आपने बहुत अनमोल बात कही इस कहानी के माध्यम से सही है यह अब धुन खुशी की है या उदासी की ये तो बजानेवाले पर निर्भर करता है ”

  2. alpana said,

    फ़रवरी 18, 2009 at 11:25 पूर्वाह्न

    ‘जिंदगी ‘से ‘जिंदगी ‘ बारे में गुफ्तगू एक कहानी बन गई.
    बहुत अच्छी कहानी लिखी है महक !

  3. Dr Anurag said,

    फ़रवरी 18, 2009 at 1:50 अपराह्न

    तजुर्बे उम्र से बड़े होते है न !

  4. फ़रवरी 18, 2009 at 1:55 अपराह्न

    बहुत सुन्दर कहानी है।बधाई स्वीकारें।

  5. फ़रवरी 18, 2009 at 2:19 अपराह्न

    ज़िन्दगी को एक पियानो की तरह समझती हूँ ,जिस में भी सफ़ेद – काली चिपिया है,मगर चाहे जो भी चिपी दबाओ संगीत ही बजता है |

    खुबसूरत अंदाज में लिखी गई संजीदा पोस्ट.

  6. rashmi prabha said,

    फ़रवरी 18, 2009 at 2:44 अपराह्न

    बहुत अनमोल सच है……..

  7. shobha said,

    फ़रवरी 18, 2009 at 4:47 अपराह्न

    बहुत सुन्दर और भावभीनी प्रस्तुति

  8. संगीता पुरी said,

    फ़रवरी 18, 2009 at 5:53 अपराह्न

    सच को दिखाती हुई सुंदर कहानी…..

  9. फ़रवरी 18, 2009 at 8:13 अपराह्न

    बहुत सुंदर, ओर एक अनमोल बात कह दी आप ने इस कहानी के माध्यम से, धन्यवाद

  10. seema gupta said,

    फ़रवरी 19, 2009 at 3:44 पूर्वाह्न

    ” something very interetsing Mehhak to read…”

    regards

  11. फ़रवरी 19, 2009 at 1:45 अपराह्न

    सचमुच, कहते है न , मन बाग़ बाग़ हो जाना , वही हो गया ! बधायी !

  12. फ़रवरी 20, 2009 at 8:34 पूर्वाह्न

    खूबसूरत कहानी की माध्यम से ज़िन्दगी के रहस्य को खोल दिया आपने………..
    सचमुच जिंदगी वैसी ही है जैसा सोचो


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