कागज़ की गुडिया

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कागज़ पर चित्र उतरा

गुडिया सजी धजी खड़ी

कमरे में अकेली देख

सैर पर निकली

हवा संग उडता  कागज़

पाठशाला पहुँचा

बसता होने कारण पढ़ाई रुकी

कागज़ की गुडिया

फिर उड़ सकी

यहाँ वहा उठाकर कोई रख देता

कुछ गिरने पर उस कागज़ से

टेबल पोंछ लेता

पढने के ख्वाब ,काम करने के

हकीक़त बन गए

दो जुग़ रोटी के लिए

नन्हे हाथ तन गए

क्या कलम उन हाथों में थमा सकेंगे ?

शायद गुमशुदा लफ्ज़ फिर जी सकेंगे ……

24 टिप्पणियाँ

  1. amar jyoti said,

    फ़रवरी 20, 2009 at 11:40 पूर्वाह्न

    मन छू लिया।

  2. फ़रवरी 20, 2009 at 11:41 पूर्वाह्न

    गुडिया सजी धजी खड़ी

    कमरे में अकेली देख

    सैर पर निकली

    हवा संग उडता कागज़

    पाठशाला पहुँचा

    बसता न होने कारण पढ़ाई रुकी

    कागज़ की गुडिया ….मन छू लिया।

  3. himalaya said,

    फ़रवरी 20, 2009 at 11:42 पूर्वाह्न

    nice…..realy maan ko chhoone wali rachana hai…………..

  4. ranju said,

    फ़रवरी 20, 2009 at 11:46 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर कागज की गुडिया

  5. फ़रवरी 20, 2009 at 11:52 पूर्वाह्न

    बहुत सुन्दर भाव है।अच्छी रचना है।बधाई।

  6. cartoonist ABHISHEK said,

    फ़रवरी 20, 2009 at 1:02 अपराह्न

    हवा संग उडता कागज़

    badhaai…

  7. rashmi prabha said,

    फ़रवरी 20, 2009 at 4:10 अपराह्न

    गुडिया की स्थिति और व्यथा……बहुत कुछ कह गई

  8. बवाल said,

    फ़रवरी 20, 2009 at 5:59 अपराह्न

    बहुत ही बहुत ख़ूब लिखा आपने महक जी दिल को छू लेने वाली पंक्तियाँ।

  9. फ़रवरी 20, 2009 at 8:53 अपराह्न

    व्यथित कर गई आप की सुंदर कविता, काश सभी को स कुछ मिले.
    धन्यवाद

  10. फ़रवरी 21, 2009 at 8:07 पूर्वाह्न

    बहूत शशक्त लेखन, गहरा चिंतन से उपजी है यह कविता
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है……..मन के भावों को कलम से उतारने की भरपूर कला है आपमें

  11. dheeraj said,

    फ़रवरी 21, 2009 at 9:59 पूर्वाह्न

    कागज की गुड़िया को आपने सही चित्रित किया है उसके साथ लिखाव‍ट भी बहुत अच्छी है धन्यवाद

  12. swapn said,

    फ़रवरी 21, 2009 at 10:13 पूर्वाह्न

    sunder rachna, , bhavnaon ki sunder abhivyakti.

  13. फ़रवरी 21, 2009 at 6:43 अपराह्न

    महक जी , बहुत गम्भीर बात को उठाया आपने इस रचना में ,
    पढ़ कर अच्छा लगा ,

  14. Satish Chandra satyarthi said,

    फ़रवरी 21, 2009 at 7:11 अपराह्न

    हलके फुल्के शब्दों में बहुत गहरी बात कह गयी हैं आप.
    आपके ब्लॉग पर आकर हमेशा एक नया आनंद मिलता है.
    बधाई

  15. फ़रवरी 21, 2009 at 10:24 अपराह्न

    @दो जुग़ रोटी के लिए
    नन्हे हाथ तन गए
    क्या कलम उन हाथों में थमा सकेंगे ?
    शायद गुमशुदा लफ्ज़ फिर जी सकेंगे

    महकजी
    आपकि लेखनी मुझे बहुत ही अच्छी लगती है। आप हमेशा ही तर्कसगत प्रस्तुति देती है बहुत ही बढीयाजी…………………….. अब बधाई लेलो जी……………………

    समय निकाल कर यहॉ भी पधारे
    http://ombhiksu-ctup.blogspot.com/

  16. alpana said,

    फ़रवरी 22, 2009 at 10:14 पूर्वाह्न

    bahut hi sundar kavita hai.
    gahre bhaav liye..Yah chitr kya aap ne banaya hai mahak..?

  17. mehek said,

    फ़रवरी 22, 2009 at 4:53 अपराह्न

    sabhi ka bahut shukran,nahi nahi alpanaji ye chitrahamne nahi banaya,google search se liya hai:)

  18. tapashwani said,

    फ़रवरी 23, 2009 at 6:58 पूर्वाह्न

    बहुत खूब प्रश्न किया आपने पर शायद इसका जवाब हमारे पास हो कर भी नही है…….
    पाठशाला
    बसता
    पोछ
    मुझे अपने बचपन की याद आ गई

  19. abhinaw-halchal said,

    फ़रवरी 23, 2009 at 10:07 पूर्वाह्न

    achchha likhati hain. kagaj ki gudia ab kalam se likhati hai. kabhi-kabhi ek gudia dusari gudia ko rachati hai. sach chhu gai kaagaj ki gudia.

  20. vijay kumar said,

    फ़रवरी 23, 2009 at 2:33 अपराह्न

    Mehak ji ,

    This is amazing work of words. ultimate composition , Bahut badhai ho.

    Please read my new poem @ http://www.poemsofvijay.blogspot.com and give ur valuable comments.

  21. Rohit Jain said,

    फ़रवरी 28, 2009 at 6:39 पूर्वाह्न

    Touching….. Beautiful!

  22. vipin said,

    मार्च 6, 2009 at 11:13 पूर्वाह्न

    बहुत सुन्दर ब्लॉग है आपका. पढ़ना सुखद रहा

    आभार
    विपिन

  23. मार्च 12, 2009 at 2:52 अपराह्न

    “कागज़ की गुड़िया”

    महक जी, यह अति उत्तम कविता थी.
    बहुत बधाईयाँ…

    ~जयंत


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