कभी तो ऐसा हो

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कभी तो ऐसा हो
नींद पलकों में सिमट जाते ही
ख्वाबों में तुम आ जाओ
हम कुछ कहने से पहले ही
मोहोब्बत की शमा जलाओ

कभी तो ऐसा हो
शाम अपने सिंगार खड़ी
टहल रही हो छत पे
हम आह्ट पहचाने तब तक
तुम देहलीज़ पार भीतर आओ

कभी तो ऐसा हो
खनके कंगन ,छुम छुम भागती पायल
जल्दी से काम निबटाये
एक दिन छुट्टी तुम भी लेलो
कोई रंगीन शरारत सिखलाओ ….

17 टिप्पणियाँ

  1. मार्च 1, 2009 at 4:38 अपराह्न

    सुन्दर रचना है, चुपके से अगर वो आ जाएँ तो क्या बात है
    खूबसूरत एहसास से बुनी है ये रचना
    बहुत खूब

  2. मार्च 1, 2009 at 5:04 अपराह्न

    मनमोहक शब्दों में सजी-रची…खास कर ये पंक्तियां तो बहुत भायी “कभी तो ऐसा हो
    शाम अपने सिंगार खड़ी/टहल रही हो छत पे/हम आह्ट पहचाने तब तक/तुम देहलीज़ पार भीतर आओ’

    सुंदर

  3. मार्च 1, 2009 at 5:31 अपराह्न

    बहुत ही शरारत भरी यह कविता, कभी तो ऎसा हो… इस सुंदर रचना के लिये धन्यवाद

  4. ShikhaDeepak said,

    मार्च 1, 2009 at 5:59 अपराह्न

    खूबसूरत भावों को बयान करती, शरारत के छींटों से भीगी सुंदर रचना।

  5. rashmi prabha said,

    मार्च 1, 2009 at 6:16 अपराह्न

    वाह महक जी……..बहुत ही अच्छी रचना

  6. pallavi trivedi said,

    मार्च 1, 2009 at 6:41 अपराह्न

    very romantic ….beautful.

  7. alpana said,

    मार्च 1, 2009 at 7:59 अपराह्न

    कभी तो ऐसा हो
    नींद पलकों में सिमट जाते ही
    ख्वाबों में तुम आ जाओ
    ……..
    Waah Mahak aaj to aap bhi rang gayin baanti rang mein –mausam ka khuub asar ho raha hai!
    yah andaaz pasand aaya…

    sundar kavita..khubsurat khyal hain..:)

  8. Dr Anurag said,

    मार्च 2, 2009 at 5:25 पूर्वाह्न

    कभी तो ऐसा हो
    शाम अपने सिंगार खड़ी
    टहल रही हो छत पे
    हम आह्ट पहचाने तब तक
    तुम देहलीज़ पार भीतर आओ

    bahut achhe mahak .bahut achhe.

  9. मार्च 2, 2009 at 6:58 पूर्वाह्न

    आपकी चाँद सी सुन्दर कविता में एक पैबंद
    कभी तो ऐसा हो
    सूरज भी जागे अलसाया चंदा को जल्दी न हो
    मुझे बाहों में उठा के ले चलो उस राह
    जो किसी राह से मिलती ना हो

  10. ranju said,

    मार्च 2, 2009 at 9:08 पूर्वाह्न

    बहुत सुन्दर लिखा है एक गजल याद आ गयी कभी यूँ भी तो हो …

  11. मार्च 2, 2009 at 10:24 पूर्वाह्न

    कभी तो ऐसा हो
    खनके कंगन ,छुम छुम भागती पायल
    जल्दी से काम निबटाये
    एक दिन छुट्टी तुम भी लेलो
    कोई रंगीन शरारत सिखलाओ …

    बहुत ही प्यारी पंक्तियाँ कही हैं आपने, बधाई।

  12. gkindian said,

    मार्च 2, 2009 at 10:48 पूर्वाह्न

    Bahut khoob likha hai. Keep it up.

  13. shobha said,

    मार्च 2, 2009 at 11:54 पूर्वाह्न

    कभी तो ऐसा हो
    शाम अपने सिंगार खड़ी
    टहल रही हो छत पे
    हम आह्ट पहचाने तब तक
    तुम देहलीज़ पार भीतर आओ
    बहुत खूब।

  14. मार्च 3, 2009 at 12:51 अपराह्न

    वाह ! वाह !

    कोमल भावों को कितनी सुन्दरता से उकेरा है आपने….सुन्दर रचना…

  15. tasliim said,

    मार्च 4, 2009 at 10:28 पूर्वाह्न

    सुंदर रचना कही है आपने।

  16. preeti tailor said,

    मार्च 19, 2009 at 10:10 पूर्वाह्न

    कभी तो ऐसा हो
    शाम अपने सिंगार खड़ी
    टहल रही हो छत पे
    हम आह्ट पहचाने तब तक
    तुम देहलीज़ पार भीतर आओ

    adbhut laga ye sochna bhi shayad ek stri ka bhitar aayne me ubhar aaya ..

  17. aleem said,

    मार्च 24, 2009 at 8:03 अपराह्न

    vaah kya khoob nibhaya matle ho , behtareen bahut umda


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