हम पंछी से उड़ पाते आकाश में

हम पंछी से उड़ पाते आकाश में

पूरा क्षितिज नाप लेते एक सांस में

सागर से मिल जाती नदी किसी मोड़

तरसती ताउम्र बुंद चाहत प्यास में

पत्ता पत्ता डोले आया बहारों का मौसम

इश्क महकता फूल बन श्वास में

लम्हों की आवाज़ गुम हुई शायाद

धड़कने निकली है उनकी तलाश में

वादियों को चूमती झूमती ” महक “

महबूब रंग निखारा खिले पलाश में

16 टिप्पणियाँ

  1. seema gupta said,

    मार्च 20, 2009 at 11:44 पूर्वाह्न

    लम्हों की आवाज़ गुम हुई शायाद

    धड़कने निकली है उनकी तलाश में
    ” beautiful lines …..loved readitng it ya”

    Regards

  2. ranju said,

    मार्च 20, 2009 at 12:22 अपराह्न

    बहुत सुन्दर लिखा है

  3. rachnasingh said,

    मार्च 20, 2009 at 12:56 अपराह्न

    तरसती ताउम्र बुंद चाहत प्यास में

    पत्ता पत्ता डोले आया बहारों का मौसम

    good

  4. neeshoo said,

    मार्च 20, 2009 at 1:16 अपराह्न

    स्वछंद मन की उड़ान । बहुत सुन्दर कविता । शब्द चयन बहुत ही बेहतरीन लगा । बधाई

  5. मार्च 20, 2009 at 2:34 अपराह्न

    सागर से मिल जाती नदी किसी मोड़
    तरसती ताउम्र बुंद चाहत प्यास में

    वादियों को चूमती झूमती ” महक “
    महबूब रंग निखारा खिले पलाश में
    महक जी
    इतनी सुन्दर कल्पना से महक रही है आपकी रचना ……..
    सारे शेर लाजवाब, आनंद आ गया पढ़ कर

  6. Anil Kant said,

    मार्च 20, 2009 at 2:39 अपराह्न

    padhkar sukoon sa mila

  7. Rewa Smriti said,

    मार्च 20, 2009 at 3:24 अपराह्न

    “लम्हों की आवाज़ गुम हुई शायाद

    धड़कने निकली है उनकी तलाश में

    वादियों को चूमती झूमती ” महक “

    महबूब रंग निखारा खिले पलाश में”

    Nice one!

    Hmmm…jab baat palash ki ched di hai aapne to mera aana swabhavik hi hai…kyunki jahan palash wahan main.

  8. rashmi prabha said,

    मार्च 20, 2009 at 3:50 अपराह्न

    kaash ! aisa hota,bahut khubsurat kaash………

  9. मार्च 20, 2009 at 7:49 अपराह्न

    हम पंछी से उड़ पाते आकाश में

    पूरा क्षितिज नाप लेते एक सांस में

    सागर से मिल जाती नदी किसी मोड़

    तरसती ताउम्र बुंद चाहत प्यास में
    बहुत ही सुंदर.
    धन्यवाद

  10. hempandey said,

    मार्च 21, 2009 at 9:43 पूर्वाह्न

    ‘हम पंछी से उड़ पाते आकाश में

    पूरा क्षितिज नाप लेते एक सांस में’
    -इस बुलंद होसले के लिए साधुवाद.

  11. मार्च 21, 2009 at 9:53 पूर्वाह्न

    रूमानी एहसास से लबरेज खूबसूरत गजल।

  12. मार्च 21, 2009 at 10:31 पूर्वाह्न

    बेहतरीन बहुत ही सुंदरता से लिखा है आपने

  13. संगीता पुरी said,

    मार्च 21, 2009 at 10:36 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर लिखा आपने ।

  14. yogesh verma said,

    मार्च 21, 2009 at 11:09 पूर्वाह्न

    हम पंछी से उड़ पाते आकाश में

    पूरा क्षितिज नाप लेते एक सांस में

    सागर से मिल जाती नदी किसी मोड़

    तरसती ताउम्र बुंद चाहत प्यास में
    sunder kavita, ek sukoon sa milta hai , kavita padhkar.

  15. मार्च 21, 2009 at 6:27 अपराह्न

    मैं हर जगह लेट ही क्यूँ पहुचता हूँ…??…….क्यूंकि मुझे कोई हड़बड़ी नहीं रहती……!!…….खैर यही कहूँगा कि इक और अच्छी रचना आपके खाते में जुड़ने की बधाई……!!

  16. preeti tailor said,

    मार्च 22, 2009 at 4:17 पूर्वाह्न

    par lagakar kalpna ke ham bhi to panchhi ban jaate hai ,
    udate hai kabhi unchi udan khayalon ki ,
    kabhi jamin par aankhen mundkar so jaate hai …..
    takte hue gaganko pyasse ham khwabonse tar ho jaate hai ….

    ek aur khubsurat udan …


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