रेत पर कदम रखते ही

रेत पर कदम रखते ही , गिली रेणू के स्पर्श से
भावनाओ का सैलाब उठा ,मन की गहराई में

वो लम्हे शंख सीपी के , यही भिखरे हुए
उन्हें समेटने लगे , लहरों ने यादों का आँचल ओढाया

भरती की रात थी , पूनम का चाँद भी था
सागर पर गिरा प्रीत चांदनी का प्याला

पीछे ही भागता है , हवा के विरुद्ध दिशा में
किनारों से मौजो का रिश्ता छुटा ,कैसे समझाऊ मन रे

23 टिप्पणियाँ

  1. neeshoo said,

    मार्च 28, 2009 at 11:40 पूर्वाह्न

    भरती की रात थी- इसका क्याअर्थ है ? मैं न समझा पाया । तस्वीर के साथ कविता का प्रवाह कम नहीं हुआ । बधाई

  2. mehek said,

    मार्च 28, 2009 at 11:54 पूर्वाह्न

    bharti ki raat se hamara matlab tha, the night of high tides jab lehere kinarro par apni hadd paar karte huye door tak behti hai.na jane aaj koshisho se bhi kuch kami si hame bhi lagi is mein khair phir bhi..shukran

  3. ranju said,

    मार्च 28, 2009 at 12:00 अपराह्न

    मन को समझाना ही तो कठिन है …बहुत सुन्दर लफ्ज़ और चित्र बहुत अच्छा लगा

  4. मार्च 28, 2009 at 12:00 अपराह्न

    bahut hi sundar bhaav hain….thoda samay ispar aur dijiye,kavita aur nikhar jayegi…

  5. rasprabha said,

    मार्च 28, 2009 at 3:52 अपराह्न

    रेत पर कदम , रेणू के स्पर्श से
    भावनाओ का सैलाब …………bahut sundar

  6. मार्च 28, 2009 at 5:07 अपराह्न

    बहुत ही सुंदर कविता,
    धन्यवाद

  7. alpana said,

    मार्च 29, 2009 at 5:41 पूर्वाह्न

    पूनम का चाँद भी था
    सागर पर गिरा प्रीत चांदनी का प्याला!

    waah ! mahak aaj to aap ne picture bahut hi sundar lagayi hai..
    aur rachna bhi utni hi khubsurat lagi.

  8. मार्च 29, 2009 at 9:24 पूर्वाह्न

    वो लम्हे शंख सीपी के , यही भिखरे हुए
    उन्हें समेटने लगे , लहरों ने यादों का आँचल ओढाया

    खूबसूरत रचना…..बहूत शशक्त अभ्व्यक्ति,
    सुन्दर रचन संसार है आपका

  9. harkirat haqeer said,

    मार्च 29, 2009 at 3:17 अपराह्न

    भरती की रात थी , पूनम का चाँद भी था
    सागर पर गिरा प्रीत चांदनी का प्याला

    पीछे ही भागता है , हवा के विरुद्ध दिशा में
    किनारों से मौजो का रिश्ता छुटा ,कैसे समझाऊ मन रे

    वाह जी वाह…!! महक जी बहोत सुन्दर ….!!

  10. rohit said,

    मार्च 29, 2009 at 11:55 अपराह्न

    hi mehak

    रेत पर कदम रखते ही , गिली रेणू के स्पर्श से
    भावनाओ का सैलाब उठा ,मन की गहराई में

    Pahle Pankti ke saath hi laga jasie kavita me kahi bheet uttar rahe hai….

    उन्हें समेटने लगे , लहरों ने यादों का आँचल ओढाया
    Lahro ka aanchal, upama jabrdast sidhhi saadi dil ko touch karne wali hai . kafi badia baate kahi hai tumene…

    Lekin ..Pankitya kafi bdai hai…har pankit alag alag kafi sundar hai. Per kahi kuch taar dhila hai..laga kuch kahte kahte attak se gai kahi….

    Plz Don’t Mind..Again Sory for that…. me koi kavi nahi. so kah nahi sakta..pathak hu, jo dil me laga kaha….

    rohit

  11. preeti tailor said,

    मार्च 31, 2009 at 6:02 पूर्वाह्न

    ahsaas ko labzomen khubsurati ke saath bandhte ho ,
    katl kar dete ho jaan le leto ho aur fir bhi kahte ho katil nahin??/
    bahut khub

  12. मार्च 31, 2009 at 9:44 पूर्वाह्न

    चलते हुए चित्र की भांति आपकी कविता मन के भावों को हिला गयी।
    ———–
    तस्‍लीम
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

  13. अप्रैल 1, 2009 at 3:02 पूर्वाह्न

    बेहतरीन रचना है महक जी, बधाई….

  14. अप्रैल 1, 2009 at 5:33 अपराह्न

    महक जी, अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकार करें…मेरे ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया…यूं ही हौसला बढ़ाते रहिए…धन्यवाद।

  15. अप्रैल 2, 2009 at 12:56 पूर्वाह्न

    सुन्दर!!

  16. Ravi said,

    अप्रैल 2, 2009 at 5:13 पूर्वाह्न

    नमस्कार!
    आज मुझे आप का ब्लॉग देखने का सुअवसर मिला।
    वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है। आप की रचनाएँ, स्टाइल अन्य सबसे थोड़ा हट के है….आप का ब्लॉग पढ़कर ऐसा मुझे लगा. आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी और हमें अच्छी -अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगे. बधाई स्वीकारें।

    आप मेरे ब्लॉग पर आए और एक उत्साहवर्द्धक कमेन्ट दिया, शुक्रिया.

    आप के अमूल्य सुझावों और टिप्पणियों का ‘मेरी पत्रिका’ में स्वागत है…

    Link : http://www.meripatrika.co.cc

    …Ravi Srivastava

  17. विनय said,

    अप्रैल 3, 2009 at 12:37 पूर्वाह्न

    अति सुन्दर रचना है!

  18. Rewa Smriti said,

    अप्रैल 4, 2009 at 6:29 पूर्वाह्न

    पीछे ही भागता है , हवा के विरुद्ध दिशा में
    किनारों से मौजो का रिश्ता छुटा ,कैसे समझाऊ मन रे

    Bahut sunder….Mann re tu kahe na dheer dhare!

  19. Devesh said,

    अप्रैल 5, 2009 at 8:22 पूर्वाह्न

    Mehak ji bahut sundar kavita ….
    Regards

  20. sajal said,

    अप्रैल 8, 2009 at 12:29 अपराह्न

    kavita bahut khoobsoorat..renu shabd ka prayog bahut achha lagaa…🙂
    aur haan tasveer bhi kam pyaari nahii!!

  21. ruchi said,

    अप्रैल 19, 2009 at 7:57 पूर्वाह्न

    bahut aachhi kavita he man ko chune vali

  22. somesh said,

    अप्रैल 20, 2009 at 12:30 अपराह्न

    सुंदर कविता बहुत-बहुत बधाई

  23. alpana said,

    मई 3, 2009 at 10:40 पूर्वाह्न

    Mahak,aap ke intzaar mein hain..ruke ruke se qadam 🙂..shayad busy hongi..?


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