माचिस की वो तीली

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बहुत कुछ कहना चाहता है दिल ..ये अचानक चलते चलते सफ़र में …हम दोनों में दूरियाँ कहा से आ गयी ..

कभी तुम कहते,कभी हम कहते …शायद दोनों ही कहना कुछ चाहते ..और उन लफ्जों का अर्थ ..तर्क हम अपने

हिसाब से लगा लेते थे …एक दीवार बन गयी है ..न टूटने वाले ख्यालों की ..या अहम् की ..या किसी मज़बूरी की …

रोज ही कितने पल साथ साथ गुजर जाते है…मगर सारे खामोश….कोई रौनक नहीं उन में….राह के एक ही किनारे पर दो अजनबी टहलते है …कुछ खोजने की कोशिश करते हुए,..क्या खोया यही न मालूम मगर…..

पुल पर चढ़कर ..निचे से बहती नदिया की कल कल संग …दिल की तरंगों को बहने के लिए छोड़ देते है…

एक तरंग से दूजी तरंग मिलती है…..और उलझने और बढती जाती है …दो हाथ नजदीक है… थामने के लिए पहल करने हिचकिचाहट …

चाँद को ताकती चार निगाहें …वो मुस्कुराता है बस….मद्दत की उम्मीद मुझसे मत रखना ….ये चांदनी की छत्

ओढा दी है आसमान पे…..इन में खोज लो कोई जज़्बात मिले देख लेना..अपने आप ही …

क्या महसूस नहीं होता तुम्हे अब ..हमारे दिल का संगीत …वही धुन आज भी लय में थिरकती है …इश्क है तुमसे ….पहेला सा ही …..लाख कोशिश करूँ कहने की ..ये जुबान को किसने रिश्वत दी न जानू……

इस खामोशी को टूटना होगा ….हमारे लिए ….बस इंतज़ार है उस लम्हे का ….जो मन की कड़वाहट को पिघला दे..

रौशन कर दे ..वो बुझी शमा की लौ …पर माचिस की वो तीली कौन बनेगा …तुम या हम…..

समझ में आए किस्मत की बात है

रब के कुछ इशारों की जुबान नहीं होती |

28 टिप्पणियाँ

  1. अप्रैल 8, 2009 at 8:39 अपराह्न

    ख़ूबसूरत ………………………………….

  2. अप्रैल 9, 2009 at 12:23 पूर्वाह्न

    बहुत खूब। हे हैं कि-

    दुनियाँ का एतबार करें भी तो क्या करें।
    आँसू भी अपने आँखका अपना हुआ नहीं।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

  3. अप्रैल 9, 2009 at 2:38 पूर्वाह्न

    सुंदर

  4. अप्रैल 9, 2009 at 3:05 पूर्वाह्न

    बहुत ही लाजवाब रचना. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

  5. neeshoo said,

    अप्रैल 9, 2009 at 3:09 पूर्वाह्न

    bahut hi sundar bhav . accha likha aap ne

  6. bhaikush said,

    अप्रैल 9, 2009 at 4:54 पूर्वाह्न

    एक तरंग से दूजी तरंग मिलती है…..और उलझने और बढती जाती है …दो हाथ नजदीक है… थामने के लिए पहल करने हिचकिचाहट …

    ज़िंदगी क़ी एक सच्चाई लिख दी आपने इन पंक्तियो में..

  7. alpana said,

    अप्रैल 9, 2009 at 5:13 पूर्वाह्न

    ओढा दी है आसमान पे…..इन में खोज लो कोई जज़्बात मिले देख लेना
    –waah! aaj mood kuchh alag lag raha hai Mahak aap ka!🙂
    bahut hi khubsurat likha hai..lagta hai jaise komal ahsason mein ab bhi doobi hui ho.🙂

    रब के कुछ इशारों की जुबान नहीं होती |

    waah! kya baat kahi hai!

  8. अप्रैल 9, 2009 at 6:27 पूर्वाह्न

    वाह…..क्या बात है, रब के इशारों की जुबां नहीं होती……………सच ही कहा है.

    और वो तीली भी कब आ जायेगी…………पता ही नहीं चलेगा, सब कुछ पिघल जायेगा, खामोशी टूट जायेगी…..सुन्दर लिखा है

  9. संगीता पुरी said,

    अप्रैल 9, 2009 at 6:27 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर …

  10. Dr Anurag said,

    अप्रैल 9, 2009 at 7:58 पूर्वाह्न

    रब के कुछ इशारों की जुबान नहीं होती |

    सच बात कही ओर महत्वपूर्ण भी..

  11. ranju said,

    अप्रैल 9, 2009 at 8:42 पूर्वाह्न

    बहुत सुन्दर इन इशारों को समझ पाना ही मुश्किल है ..

  12. Prashant said,

    अप्रैल 9, 2009 at 8:43 पूर्वाह्न

    बहुत ही सुन्दर रचना
    शुभकामनायें..

  13. anil kant said,

    अप्रैल 9, 2009 at 9:43 पूर्वाह्न

    पर माचिस की वो तीली कौन बनेगा …तुम या हम …

    बेहतरीन ….बहुत अच्छी लगी मुझे आपकी ये रचना

  14. अप्रैल 9, 2009 at 9:47 पूर्वाह्न

    क्या महसूस नहीं होता तुम्हे अब ..हमारे दिल का संगीत …वही धुन आज भी लय में थिरकती है …इश्क है तुमसे ….पहेला सा ही …..लाख कोशिश करूँ कहने की ..ये जुबान को किसने रिश्वत दी न जानू……

    अब आप उपन्यास लिखिए. आपकी भाषा देर तक पढ़ने का मन करता है.

  15. sandeep said,

    अप्रैल 9, 2009 at 7:02 अपराह्न

    बहुत खूबसूरत पोस्ट…

  16. मीना said,

    अप्रैल 9, 2009 at 8:37 अपराह्न

    सुलगते भीगे से भाव कहने का अन्दाज़ नया लगा..

  17. rashmi prabha said,

    अप्रैल 10, 2009 at 6:35 पूर्वाह्न

    रब के कुछ इशारों की जुबान नहीं होती |

    ……..sach hai.
    aapki har rachna me gahre pyaar ka samavesh hota hai,jo mahsoos hota hai

  18. अप्रैल 10, 2009 at 12:28 अपराह्न

    बहुत ही भावपूर्ण रचना..

  19. nirjharneer said,

    अप्रैल 11, 2009 at 9:21 पूर्वाह्न

    wahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh kya marmsparshi bhav hai yatarthparak
    sundar ati sundar kam shabdon mein bhaav ko moort roop diya hai aapne ..

  20. अप्रैल 11, 2009 at 12:39 अपराह्न

    सच और सुंदर ……

    रब के कुछ इशारों की जुबान नहीं होती |

  21. अप्रैल 11, 2009 at 2:30 अपराह्न

    “चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाय हम तुम …”

  22. अप्रैल 13, 2009 at 5:34 पूर्वाह्न

    bahut khub……………
    pyar jise hua use to amar hona hi hai,kyonki mahbub ki yande marne ki izazat nahi deti.

  23. preeti tailor said,

    अप्रैल 13, 2009 at 8:25 पूर्वाह्न

    aur ek khubsurat khayal se vakif karaya …

  24. अप्रैल 17, 2009 at 2:55 पूर्वाह्न

    “रब के कुछ इशारों की जुबान नहीं होती !”

    Dear Mehek, ye wlai post main bahut pahle padh chuki thee lekin comment nahi kar pa rahi thee, kyunki ise main baar baar padhna chah rahi thee. Iske last line mujhe bahut hi achha and touchy laga hai.

  25. अप्रैल 20, 2009 at 7:33 पूर्वाह्न

    life is full of gifts from almighty—it is a travellogue —while scaling miles of life we see many heavenly scenes sometime we halt to admire any one scene and are mesmerised by the sensation this scenario occuring owing to someones presence and cease to view the numerous scenes to come forth–!getting tranced by this sensation we miss many new ones—leading to eventual dependency–so much that we get ready to sacrifice ourself on the altar to retain this shotr lived stay of sensuality—our own self also is lost somewhere and only remains a pain which we caress to worship.Alas! now ignoring gods gifts we are at the mercy of someones occasional smile–!beautiful is the gesture of sacrificing self but then bring light to world by a burning match stick and burn to enlighten the world. And friend give a start to your stopped steed who knows an still more beautiful scene awaits ahead
    Do you remember Robert Frost
    —woods are lovely dark and deep
    but I have many promises to keep
    and miles to go before I sleep,and miles to go before I sleep!
    sorry if I hurt you somewhere but believe me my aim is to provide releif to your pains only.I have just read your poem I am a new visitor to this website.
    Best wishes for a glorious life to comeforth and appreciation[only technical aspect of your poem] for your poem.Regards.
    Dr Vishwas Saxena
    09414550982

  26. preeti tailor said,

    अप्रैल 29, 2009 at 8:48 पूर्वाह्न

    machis ki tili ko na puchha kisine jalna bhi hai ya nahin?
    bas ghis di aur jala di khud jalkar duniya roshan kar gayi ……

  27. subhash chander said,

    जुलाई 13, 2009 at 7:13 पूर्वाह्न

    apki adhikansh rachnayen achhi hain.visheshkar ghazalen.badhai


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