इन फूलों की बारिश में

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इन फूलों की बारिश में
भीग लेते है हम भी
मोहोब्बत के इत्र की महक
जरा बदन पर चढा लूँ
अगले मौसम तक फिर
ये ताजगी रहेगी मन में .
—————————————————————————-
रिझाने प्रियतम फूल को,गुनगुनाया,बहलाया
खिली हर पाखी जब नाजुक प्रेम स्पर्श सहलाया
जज्बातों में बह के अपना मधुरस दे बैठा
मेरी मन तितली तो बस खुशबु की दीवानी है |

ye chitra humne kisi ke blog se liya hai,blog ka naam yaad nahi,unka shukran.

22 टिप्पणियाँ

  1. अप्रैल 14, 2009 at 7:04 पूर्वाह्न

    इन फूलों की बारिश में
    भीग लेते है हम भी
    मोहोब्बत के इत्र की महक
    जरा बदन पर चढा लूँ
    अगले मौसम तक फिर
    ये ताजगी रहेगी मन में

    वाह…………इतनी दिलकश सोच….महकता हुवा एहसास हैं ये चंद लाइनें………..
    बहुत खूब……..खुशबू महकती रहे अगले मौसम तक…………नवीन सोच

  2. neeshoo said,

    अप्रैल 14, 2009 at 7:07 पूर्वाह्न

    इन फूलों की बारिश में
    भीग लेते है हम भी
    मोहोब्बत के इत्र की महक
    जरा बदन पर चढा लूँ

    सुन्दर कविता की बेहतरीन लाइनें ।

  3. rashmi prabha said,

    अप्रैल 14, 2009 at 7:08 पूर्वाह्न

    phulon kee baarish …….aur aapke khyaal,dil rumaani ho chala

  4. ranju said,

    अप्रैल 14, 2009 at 7:12 पूर्वाह्न

    बहुत सुन्दर लगी यह रचना

  5. Prashant said,

    अप्रैल 14, 2009 at 7:47 पूर्वाह्न

    सुन्दर रचना है आपकी..
    आपने बहुत अच्छा लिखा है..
    सुन्दर..

  6. Dr Anurag said,

    अप्रैल 14, 2009 at 8:06 पूर्वाह्न

    दिलचस्प…..!यूँ ही भीगिये….

  7. preeti tailor said,

    अप्रैल 14, 2009 at 8:10 पूर्वाह्न

    bahut hi khubsurat…

  8. अप्रैल 14, 2009 at 8:41 पूर्वाह्न

    ये फूलों की बारिश की खुशबू बहुत गहरी है.

  9. alpana said,

    अप्रैल 14, 2009 at 10:07 पूर्वाह्न

    bahut hi sundar chitr hai Mahak..main to wahin thahar gayi thi.socha ki is ped ke neechey phool jhrtey dekhna kitna bhata hoga!

    phir tumhari kavita padhi..
    रिझाने प्रियतम फूल को,गुनगुनाया,बहलाया
    खिली हर पाखी जब नाजुक प्रेम स्पर्श सहलाया’

    sundar panktiyan..

  10. ShikhaDeepak said,

    अप्रैल 14, 2009 at 11:28 पूर्वाह्न

    बहुत ही सुंदर और महकते भाव। खूबसूरत रचना।

  11. अप्रैल 14, 2009 at 11:31 पूर्वाह्न

    बहुत नायाब और ताजगी से भरी रचना. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

  12. अप्रैल 14, 2009 at 1:18 अपराह्न

    इन फूलों की बारिश में
    भीग लेते है हम भी
    मोहोब्बत के इत्र की महक
    जरा बदन पर चढा लूँ
    अगले मौसम तक फिर
    ये ताजगी रहेगी मन में .

    महक जी ये कविता आपके नाम के अनुरूप महक रही है जिसकी महक दूर दूर तक पहुंच रही है बहुत ही बेहतरीन रचना बहुत बहुत शुभकामनाएं और फोटो भी काफी मनमोहक लिया है जिस भी बलाग से लिया उन्‍हें भी बधाई

  13. shobhana said,

    अप्रैल 14, 2009 at 6:33 अपराह्न

    kvita ki khushbu man me bs gai

  14. अप्रैल 14, 2009 at 8:39 अपराह्न

    एक सुन्दर एहसास है।बहुत बढिया!!

  15. anil kant said,

    अप्रैल 14, 2009 at 10:22 अपराह्न

    dil rumani ho gaya …bahut hi khoobsurat

  16. tasliim said,

    अप्रैल 15, 2009 at 7:35 पूर्वाह्न

    जज्बात की ये बारिश तन मन को भिगाती है।
    ———-
    तस्‍लीम
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

  17. vijay said,

    अप्रैल 15, 2009 at 9:46 पूर्वाह्न

    क्या बात है महक जी। बहुत ख़ूब

    मोहब्बत के इत्र की महक
    जरा बदन पर चढा लूँ
    अगले मौसम तक फिर
    ये ताजगी रहेगी मन में

    आपकी महक यहां तक आ रही है।

  18. Arjav said,

    अप्रैल 15, 2009 at 3:30 अपराह्न

    नीचे वाली ज्यादा अच्छी लगी !

  19. अप्रैल 15, 2009 at 9:25 अपराह्न

    Mehek Ji,

    Another Mehekati kavitaa from you.
    Keep it up.

    ~Jayant

  20. अप्रैल 16, 2009 at 5:19 पूर्वाह्न

    इन फूलों की बारिश में भीगने को जी चाहता है।
    ———–
    तस्‍लीम
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

  21. अप्रैल 17, 2009 at 2:47 पूर्वाह्न

    इन फूलों की बारिश में
    भीग लेते है हम भी
    मोहोब्बत के इत्र की महक
    जरा बदन पर चढा लूँ
    अगले मौसम तक फिर
    ये ताजगी रहेगी मन में .

    Beautiful poem, and I wish badra ghumar ghumar ghir aayo!🙂

  22. M Verma said,

    जुलाई 10, 2009 at 11:21 अपराह्न

    बहुत सुन्दर
    वाह


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