आज की सुबह

आज की सुबह बड़ी सुहानी रही | बादलों का झुंड आसमान पर पेंडुलम सा झूलता रहा |
ठंडी ठंडी हवाओ का घर की गलियारों से गुजरना , हमारा ध्यान न हो तब अचानक से
आकर मुख पर थपकी देना,जैसे आंख मिचोली खेल रही हो | सहर होकर तीन घंटे हुए
दिनकर के दर्शन नहीं | गर्मी के दिनों में ऐसा माहोल बहुत अच्छा लगता है |
सारे काम फटाफट हो गए | बहती हवा की गुदगुदी से मन् बहेका बहेका सा झुमने लगा |
दिमाग की झील में थई थई नाचने लगा | शायद मुठी भर ख़ुशी इसीको कहते है ,सो अदृश्य रूप
में अचानक आ जाए , और युही मुस्कराहट के टोकरे से थोडी लबो पर सजा दे |
हमारे सामनेवाले घर में दो बड़े बादाम के पेड़ है | लछेदार बादाम से लदे हुए | ऐसे बहके मौसम में
बन्दर भी आ गए ब्रेक फास्ट करने | इतनी धींगा मस्ती ,उछल कूद के पुचो मत | सारे मोर्निंग
स्कूल जाते बच्चे खड़े हो के मज़ा ले रहे थे | बड़े ऑफिस जानेवाले बच्चे भी:) ,हम भी:) |
बन्दर बादाम निचे फेकते ,हम उठा लेते | शाम को घर वापसी पे उन्हें फोड़ के खाने का कार्यक्रम होगा |
अभी तो स्थेथोस्कोप गले में लटकाए भागना होगा |

17 टिप्पणियाँ

  1. seema gupta said,

    अप्रैल 21, 2009 at 4:09 पूर्वाह्न

    ” bhut khubsurat njare ka chitran..”

    regards

  2. अप्रैल 21, 2009 at 4:12 पूर्वाह्न

    इतनी धींगा मस्ती ,उछल कूद के पुचो मत | सारे मोर्निंग
    स्कूल जाते बच्चे खड़े हो के मज़ा ले रहे थे | बड़े ऑफिस जानेवाले बच्चे भी:) ,हम भी:) |
    बन्दर बादाम निचे फेकते ,हम उठा लेते |

    बहुत सहजता से आपने इन खूबसूरत क्षणों को लिपिबद्ध किया है. आपका गद्य भी एकदम कविता लग रहा है. और इन क्षणिक खुशियों को कोई कवि हृदय इन्सान ही पकड सकता है.
    बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

  3. अप्रैल 21, 2009 at 4:45 पूर्वाह्न

    बिल्कुल सही लिखा है. मुट्ठी भर खुशी इसी को कहते हैं.

  4. Jayant said,

    अप्रैल 21, 2009 at 5:50 पूर्वाह्न

    Waah waah…
    Aap bhi bachche :))

    Sach hai… Jeevan ki daud me bhaganaa hi padataa hai..

    ~Jayant

  5. varsha said,

    अप्रैल 21, 2009 at 6:25 पूर्वाह्न

    इसी को महसूस कर पाना…कहते हैं।

  6. अप्रैल 21, 2009 at 6:37 पूर्वाह्न

    हमारे आस पास कितना कुछ बिखरा पड़ा रहता है लेकिन हम उस से सदा अंजान रहते हैं।आप की पोस्ट पढ़ कर सुबह की ठंडी हवा हमें भी महसूस हुई।धन्यवाद।

  7. nirmla said,

    अप्रैल 21, 2009 at 7:15 पूर्वाह्न

    jam bhi computer ke saamne baithhe hi the ki kahin se ek bhal si mehak ayee pata chal gaya ki aaj ka din achha rahega abhar

  8. rashmi prabha said,

    अप्रैल 21, 2009 at 7:32 पूर्वाह्न

    सुबह की ताजगी और आपका खुशनुमा अनुभव …..
    कुछ ताजगी हमें भी मिल गई…

  9. अप्रैल 21, 2009 at 9:26 पूर्वाह्न

    यही सरल और सहज भाव मन में उतर जाते हैं … प्रकृति , मानव और पशु तीनों का सुन्दर चित्रण …चित्र आँखो के सामने आ जाता है… एक दूसरे से इस तरह जुड़ना ही जीवन में खुशी ले आता है.

  10. Digamber said,

    अप्रैल 21, 2009 at 10:51 पूर्वाह्न

    सुबह की भागम भाग और भोली भाली मस्ती को सहज रूप से उतार दिया है आपने कलम से…………
    सुन्दर लिखा है

  11. अप्रैल 21, 2009 at 11:20 पूर्वाह्न

    सुबह जब इतनी सुंदर हो, तो दिन तो अच्छा होगा ही।

    ———-
    अभिनय के उस्ताद जानवर
    लो भई, अब ऊँट का क्लोन

  12. HEY PRABHU YEH TERA PATH said,

    अप्रैल 21, 2009 at 3:21 अपराह्न

    सुन्दर लिखा है

  13. अप्रैल 21, 2009 at 5:21 अपराह्न

    आप के शहर का ये मौसम और यहाँ वाराणसी में पारा ४४ डिग्री के पार! पर आप की रचना से कुछ ठंढक का अहसास हुआ।धन्यवाद…..
    आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।
    मैं अपने तीनों ब्लाग पर हर रविवार को ग़ज़ल,गीत डालता हूँ,जरूर देखें।मुझे पूरा यकीनहै कि आप को ये पसंद आयेंगे।

  14. अप्रैल 21, 2009 at 7:58 अपराह्न

    बड़े गहरे उतरी अभिव्यक्ति के लिए..जबरदस्त!!

  15. अप्रैल 22, 2009 at 10:23 पूर्वाह्न

    सुबह की ताजगी और आपका खुशनुमा अनुभव …..
    आनन्द आ गया.

  16. Dr Vishwas Saxena said,

    मई 8, 2009 at 6:47 पूर्वाह्न

    good at last some positivity appears in the perception.Congrats and all the best for future journey of life.Regrds
    Dr Vishwas Saxena


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