रेत पर पाओ के कुछ निशान थे

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रेत पर पाओ के कुछ निशान थे
लहरों से मिट जायेंगे अन्जान थे

मुद्दतों बाद गांव की याद आई
बचपन खेले वो कमरे वीरान थे

शहादत पे सियासत हावी हो रही
खोये वो लोग देश की जो शान थे

दूर बैठकर परेशानियाँ हल न होंगी
मुश्किल लगे सवाल बड़े आसान थे

काफिये मिला दो और बनी ग़ज़ल
बहर का ज्ञान नहीं,हम नादान थे

महफिल में बैठी नज़्म सुनाये ‘महक’
दिल में ऐसे ही कुछ अरमान थे

23 टिप्पणियाँ

  1. अप्रैल 25, 2009 at 7:17 पूर्वाह्न

    क्या लाजवाब बात कही है. श्रेष्ठतम रचना. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

  2. rashmi prabha said,

    अप्रैल 25, 2009 at 8:25 पूर्वाह्न

    सच की बानगी निशान बनकर रह जाती है,
    जो डूबकर भी दिखाई देती है………

  3. roushan said,

    अप्रैल 25, 2009 at 8:47 पूर्वाह्न

    बैठे रहे रोज़न पे देर तक फिर से
    खुद अपना ही इंतज़ार था शायद

  4. अप्रैल 25, 2009 at 2:53 अपराह्न

    “महफिल में बैठी नज़्म सुनाये ‘महक’
    दिल में ऐसे ही कुछ अरमान थे”

    पूरे हो तो रहे हैं आपके अरमान !!
    बधाई ..

  5. अप्रैल 25, 2009 at 3:39 अपराह्न

    “शहादत पे सियासत हावी हो रही
    खोये वो लोग देश की जो शान थे”

    मैं इन पक्तियों से परास्त हो गया..
    मेरे मन के सारे भाव आपने २ पंक्तियों में कह दिए…

    वाह वाह….
    ~जयंत

  6. HEY PRABHU YEH TERA PATH said,

    अप्रैल 25, 2009 at 5:43 अपराह्न

    बहुत ही सुन्दर श्रेष्ठतम रचना हेतु बहुत शुभकामनाएं.
    हे प्रभु यह तेरापथ

  7. Ketan said,

    अप्रैल 25, 2009 at 6:23 अपराह्न

    मुद्दतों बाद गांव की याद आई
    बचपन खेले वो कमरे वीरान थे

    kya baat hai.. bahut badiya rachna.. ye sher bahut pasand aya .. bahut khoob mehak ji..

  8. SHAN said,

    अप्रैल 25, 2009 at 7:42 अपराह्न

    कल्पना में वास्तविकता लाइये कविता खूबसूरत हो जायेगी ..जो देखा वो लिखिये रचना हो जायेगी ..रेत पर निशान दिखते और मिटते रहेगे ..आप लिखते रहिये ..एक दिन कामयाब हो जायेगीं….

  9. अप्रैल 26, 2009 at 1:48 पूर्वाह्न

    शब्दों के पुष्पों से महकती हुई कविता के लिए बधाई।

  10. Digamber said,

    अप्रैल 26, 2009 at 7:15 पूर्वाह्न

    मुद्दतों बाद गांव की याद आई
    बचपन खेले वो कमरे वीरान थे

    दूर बैठकर परेशानियाँ हल न होंगी
    मुश्किल लगे सवाल बड़े आसान थे

    बहुत सुन्दर रचना है……….ये दोनों शेर लाजवाब हैं ……………..और बहर वाले शेर में आपने भावुक कवी मन की बात कह दी है

  11. alpana verma said,

    अप्रैल 27, 2009 at 12:07 अपराह्न

    शहादत पे सियासत हावी हो रही
    खोये वो लोग देश की जो शान थे

    waah! umda!

    yah aap ki ab tak ki sab se achchee gazalon mein se ek lagi..Mahak sach mein bahut achcha likha hai…sabhi sher qabile taarif lagey!

    [sorry,der se pahunchi..friday-saturday net par aa nahin paati–busy days hotey hain.]

  12. Syed Akbar said,

    अप्रैल 27, 2009 at 4:50 अपराह्न

    बहुत खूब लिखा है…

  13. chandra mohan gupta said,

    अप्रैल 28, 2009 at 3:14 पूर्वाह्न

    रेत पर पाओ के कुछ निशान थे
    लहरों से मिट जायेंगे अन्जान थे

    शहादत पे सियासत हावी हो रही
    खोये वो लोग देश की जो शान थे

    बहुत सुन्दर रचना है……….ये दोनों शेर लाजवाब हैं ……………..
    और बहर वाले शेर में आपने भावुक कवि के मन की बात कह दी है.

    बधाई.

    चन्द्र मोहन गुप्त

  14. Abhishek said,

    अप्रैल 28, 2009 at 5:17 पूर्वाह्न

    पोस्ट करने के ही लिखी गयी पोस्ट लग रही है ! वैसे अच्छी है !

  15. अप्रैल 28, 2009 at 11:13 पूर्वाह्न

    मुददतों बाद गांव की याद आई,
    बचपन खेले वो कमरे वीरान थे।

    हासिले गजल है आपका यह शेर, मुबारकबाद कुबूल हो।

    ———-
    S.B.A.
    TSALIIM.

  16. preeti tailor said,

    अप्रैल 29, 2009 at 8:54 पूर्वाह्न

    retse ghulo ,ret se chalo,
    abhi ruko abhi baho….
    kabhi dhalo kabhi milo …
    ek dhermen bhi astitv apna banaye rakho,
    ek nishan bana do ,
    use apneme ghol do…

  17. अप्रैल 29, 2009 at 11:33 पूर्वाह्न

    ये दिन पर बने निशान हैं, जो रेत पर भी दिख रहे हैं। खूबसूरत रचना, ढेर सारी बधाईयाँ।
    ———-
    सम्मोहन के यंत्र
    5000 सालों में दुनिया का अंत

  18. nirjharneer said,

    मई 1, 2009 at 6:40 पूर्वाह्न

    wahhhhhhhhhh..kya khoobsurat rachna ki hai.
    yun to aap jo likhti hai bhavpoorn hi likhti hai
    par ye rachna kuch dil ke jyada hi kariib rahii
    bandhaii ho ..yakinan kabil-e tariif

  19. Rewa Smriti said,

    मई 3, 2009 at 8:36 पूर्वाह्न

    “दूर बैठकर परेशानियाँ हल न होंगी
    मुश्किल लगे सवाल बड़े आसान थे”

    Bahut sunder!
    Dear Mehek, kis line per comment karun? Yahan to her shabd se khushbu aa rahi hai. Never ever stop writing…I am always there to read your poem till I alive! Yea, i may be late writing comment but I read each and every of your poems!

  20. Dr Vishwas Saxena said,

    मई 5, 2009 at 5:25 पूर्वाह्न

    गाँव वाही पर फसल नई थी
    वीरान कमरों मे अब नसल नई थी
    खोये शहीदों की बूँद से उपजे
    वीर जांबाज़ है फिर से
    दूर बैठ भी होगी खतम परेशानी
    लम्बे हाथों की मेहनत से होगी आसानी
    Dear Author,
    I think lamentation and melancholy is not an ornament for a poem,yes a few friends may appreciate it,yet you are misleading the whole community of poetry lovers by spreading a message of hopelessness ignited by a few happenings and demotivating them for doing nothing as hope is dimnishing.Remember a poet has a very important role to play,he is a opinion builder,success counseller and activator par esteem.Spread the fragrence of hardwork,target acquisition,innovation,sacrifice,valour,bravery,
    etc. and recharge the fast tiring youth power and reshape the future.I have reformed your poem below and projected a brighter aspect of your every line.Since I am not praising your work you can treat me as crtic and not a friend,but i can not do a blind praise when I view alot of hopes in your poetry.
    Read the recomposed poem of yours and think,if not right,where I am wrong
    लहेरो से धुले निशान जल मे फिर घुले
    धुप का अगहोश पाकर जीवन बन खिले
    गाँव वही पर फसल नई थी
    वीरान कमरों मे अब नसल नई थी
    खोये शहीदों की बूँद से उपजे
    वीर जांबाज़ है फिर से
    दूर बैठ भी होगी खतम परेशानी
    लम्बे हाथों की मेहनत से होगी आसानी
    लफ्ज़ जोड़ जोश के बना फतह गान
    ज्ञान मे शक्ति है यह तो जान
    गढ़ प्रगति का जीतो तो सही
    तब विजय की महफ़िल मे नज़्म गाना
    सृजन चिंतन को कर्म मे डाल सफलता की सजाओ बज्म
    तब ही तुम्हे हक है की सुनाओ नज़्म
    I apologize for my candid statement and hope for some good and positive poem in future pardon me if I anywhere hurt your enthuthiasm.Regards
    Dr Vishwas Saxena
    09414550982

  21. kirankumar said,

    जुलाई 28, 2009 at 9:40 पूर्वाह्न

    mansane aayushhat yekada taru prrmachya pavsat chimb bhijave.
    karan prem manasala changala manus banavate
    prem karnarya sarvanna mazya shubhechha.

  22. जुलाई 31, 2009 at 7:23 पूर्वाह्न

    aap ki rachana “Ret par paon ke kuchh nishan the” ko padkar mera hraday bhi mahak utha


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