तन्हा

यु मुह मोड़ के जानेवाले
रुक जरा एक तकरार अभी बाकी है

जितनी दुआए मांगी थी तेरे लिए खुदा से
उनका अक्स हमारे हाथों पर बाकी है

ले जा वो सितारे जो तेरे हिस्से के है
कुछ रौशनी की बूंदे पलको पर बाकी है

इस गीत को यही होने दो हमारे पास
कुछ लफ्ज़ -ए- एहसास पिरोना बाकी है

===============

खूबसूरत फ़िज़ाओं में चाँद
तन्हा तू भी और तन्हा हम भी
तारों को हमने उनका घर रौशन करने
अपने गलियारों से रुखसत किया

27 टिप्पणियाँ

  1. विनय said,

    अप्रैल 29, 2009 at 11:20 अपराह्न

    सुन्दर भाव लिये हुए एक शब्द चित्र


    तख़लीक़-ए-नज़रचाँद, बादल और शामगुलाबी कोंपलेंतकनीक दृष्टा

  2. अप्रैल 30, 2009 at 2:35 पूर्वाह्न

    हर कोई तन्हा यहाँ लेकिन महक है शेष।
    बूंद रौशनी की लिए लगता पलक बिशेष।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

  3. अप्रैल 30, 2009 at 5:30 पूर्वाह्न

    इस गीत को यही होने दो हमारे पास
    कुछ लफ्ज़ -ए- एहसास पिरोना बाकी है

    बहुत ही, उम्दा और बेमिसाल रचना, खूबसूरत भाव संप्रेषण. शुभकामनाएं.
    .blogspot.com
    रामराम.

  4. zindgikepanne said,

    अप्रैल 30, 2009 at 9:14 पूर्वाह्न

    कुछ रौशनी की बूंदे पलको पर बाकी है
    bahut sunder…

  5. Digamber said,

    अप्रैल 30, 2009 at 10:46 पूर्वाह्न

    खूबसूरत फ़िज़ाओं में चाँद
    तन्हा तू भी और तन्हा हम भी
    तारों को हमने उनका घर रौशन करने
    अपने गलियारों से रुखसत किया

    khoobsoorat शब्द पिरोये हैं …………गुलज़ार की याद करा दी आपने….शुक्रिया

  6. Alpana said,

    अप्रैल 30, 2009 at 11:14 पूर्वाह्न

    जितनी दुआए मांगी थी तेरे लिए खुदा से
    उनका अक्स हमारे हाथों पर बाकी है

    waah ! yah sher khaas pasand aaya.
    तारों को हमने उनका घर रौशन करने
    अपने गलियारों से रुखसत किया
    kya baat hai!!
    bahut khuub likha hai..aaj koi tasveer nahin??

  7. mehek said,

    अप्रैल 30, 2009 at 2:07 अपराह्न

    alpanaji jaldi mein post kiya,tasveer lagane mein bahut deer lagti hai:)

  8. अप्रैल 30, 2009 at 7:18 अपराह्न

    बहुत सुन्दर!!

  9. अप्रैल 30, 2009 at 7:19 अपराह्न

    तस्वीर की कमी तो हमें भी खली.

  10. अप्रैल 30, 2009 at 7:32 अपराह्न

    बहुत बढिया!!

  11. मई 1, 2009 at 8:10 पूर्वाह्न

    क्या बात कही है आपने, रूक जरा एक तकरार अभी बाकी है।
    बेहद मौलिक सोच, पहली बार इस तरह के ख्याल पढ रहा हूं।
    ———-
    सावधान हो जाइये
    कार्ल फ्रेडरिक गॉस

  12. मई 1, 2009 at 2:41 अपराह्न

    “ले जा वो सितारे जो तेरे हिस्से के है
    कुछ रौशनी की बूंदे पलको पर बाकी है ”

    यार… मजा आ गया…
    (क्षमा करें, यार और मजा जैसे शब्दों का प्रयोग किया… पर इसे पढ़ कर अति आनंद से यही प्रतिक्रया हुई..)

    सुन्दर सुन्दर..

    ~जयंत

  13. Alpana said,

    मई 1, 2009 at 3:24 अपराह्न

    🙂 koi baat nahin Mahak…tumahri rachna hi apne aap mein bahut hai..tasweer ki koi baat nahin aise hi jigyasa thi.:)

  14. rashmi prabha said,

    मई 1, 2009 at 3:37 अपराह्न

    jab bhi aapki rachnaaon ke kareeb aati hun,kuch samay ke liye ehsaas wahin ruk jaate hain……

  15. Rewa Smriti said,

    मई 3, 2009 at 8:33 पूर्वाह्न

    “ले जा वो सितारे जो तेरे हिस्से के है
    कुछ रौशनी की बूंदे पलको पर बाकी है”

    Simply Beautiful! Dil hoom hoom kare…ghabraye, ek bund kabhi pani ki more ankhiyon se barsaye!

  16. shobhana said,

    मई 3, 2009 at 6:39 अपराह्न

    but bdhiya

  17. preeti tailor said,

    मई 4, 2009 at 8:09 पूर्वाह्न

    ruth kar jaane valon ko mana lo,
    jindagi ek baar hi milti hai ,
    rishte to mil jaate hai lakhon ,
    dosti ki dua milti hai mushkil se kabhi …

  18. Dr Vishwas Saxena said,

    मई 5, 2009 at 5:47 पूर्वाह्न

    Dear Author
    If you prayed for him/her and by lts virtue he is mounting the horse of success then why you are feeling forsaken and doomed–?let him accomplish success and you define your role in rebuilding any other soul! remember if you pray for someone pray selflessly,again I have reformed your poem——
    it should read as under:
    यूं मुँह मोडकर जानेवाले फिर पलट कर मत देखना
    तेरा कम है चलना तू मत ही रूकना
    तेरी लिए मांगी दूओं का असर अब दीखता है
    अक्स नहीं आकृति कैनवास पैर रूकता है
    सितारे तू पा अपने वजूद से
    वो ही तेरा हिस्सा है
    गीत जीत के तो और भी बहुत बनेगे
    ख़तम अब यह वाला किस्सा है
    कईनत जब है ईश्वर की तो तनहा कौन है
    इधर चाँद उधर व्योम है
    चमकेंगे हम ले सारी रोशनी तारों की
    ताकि रोशनी की सरित बहे हर गलियारे की
    Best regards and apology
    Dr Vishwas Saxena

  19. मई 7, 2009 at 8:27 पूर्वाह्न

    हमेशा की तरह खूबसूरत गजल। आप हमेशा ऐसी रचनाएं कहती रहें यह आस बाकी है।

    ———–
    SBAI TSALIIM

  20. मई 8, 2009 at 3:21 पूर्वाह्न

    जितनी दुआए मांगी थी तेरे लिए खुदा से
    उनका अक्स हमारे हाथों पर बाकी है

  21. sajal said,

    मई 10, 2009 at 8:34 अपराह्न

    तारों को हमने उनका घर रौशन करने
    अपने गलियारों से रुखसत किया

    bahut hi achhi tulna ki gayee yahaan…chand ko leke is tarah ka koi bhi naya prayog umda ban padta hai…isi prakaar shuruvaat bhi bahut achhi hai🙂

    http://www.pyasasajal.blogspot.com

  22. ankit said,

    जुलाई 14, 2009 at 4:06 अपराह्न

    Hey mehak
    it’s to cool
    yaar aap ki soch ki mehak ne to hume diwana kar diya
    u r mind blowing

  23. ankit said,

    जुलाई 14, 2009 at 4:07 अपराह्न

    hey mehak
    aap ki soch ki mehak me hum sab ko Diwana kar diya u r thinkg is mind blowing

  24. जुलाई 16, 2009 at 4:29 अपराह्न

    महक यहाँ आकर तो शब्दों का भावों का खजाना हाथ लग गया ।
    इस गीत को यही होने दो हमारे पास
    कुछ लफ्ज़ -ए- एहसास पिरोना बाकी है ।
    वाह वाह ।

  25. जुलाई 22, 2009 at 10:38 अपराह्न

    dar toh ik aaya tha, thehra nahin main der talak
    jaise sajdon se tahi[khaali] meri jabin ho gayi hai


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