राह में यूही मिल गया कोई

Water lilies

 

 

 

 

राह में यूही मिल गया कोई
वक़्त में कितना बदल गया कोई

नज़दीक से गुज़रे, पहचान न पाए
अनजान सा करीब से निकल गया कोई

याद ही नही के रूबरू हुए कभी
याद सा दिल में मचल गया कोई

28 टिप्पणियाँ

  1. M Verma said,

    जुलाई 30, 2009 at 2:49 अपराह्न

    अनजान सा करीब से निकल गया कोई
    ===
    बहुत खूब सुन्दर

  2. जुलाई 30, 2009 at 2:57 अपराह्न

    बेहद सुंदर रचना. शुभकामनाएं.

    रामराम.

  3. जुलाई 30, 2009 at 6:32 अपराह्न

    नज़दीक से गुज़रे, पहचान न पाए
    अनजान सा करीब से निकल गया कोई

    सही कहा वर्तमान जीवन मे अक्सर ऐसा होता है।
    आपकी इन चार लाईनो को अक्सर मनुष्य जीवन के करीब महसुस किया जाता रहा।
    अति सुन्दर! * * * * *

    आभार
    हे प्रभु यह तेरापन्थ
    मुम्बई टाईगर

  4. रंजन said,

    जुलाई 31, 2009 at 1:38 पूर्वाह्न

    क्या बात है.. बहुत खुब.

  5. kshama said,

    जुलाई 31, 2009 at 6:02 पूर्वाह्न

    Behad sundar, man me kasak-see paida kartee panktiyan..!

  6. dinesh said,

    जुलाई 31, 2009 at 7:29 पूर्वाह्न

    सच है कोई रह में मिल जाता है, लेकिन उसकी याद उम्र भर पीछा करती है !

  7. rashmi prabha said,

    जुलाई 31, 2009 at 8:43 पूर्वाह्न

    याद ही नही के रूबरू हुए कभी
    याद सा दिल में मचल गया कोई……bahut hi achhi

  8. digamber said,

    जुलाई 31, 2009 at 1:07 अपराह्न

    याद ही नही के रूबरू हुए कभी
    याद सा दिल में मचल गया कोई

    लाजवाब .. बहूत ही हसीं लिखा है….. करीब से लिखा है

  9. जुलाई 31, 2009 at 2:10 अपराह्न

    नज़दीक से गुज़रे, पहचान न पाए
    अनजान सा करीब से निकल गया कोई
    वाह! मह्कजी ! सुंदर रचना। बधाइ स्वीकारें।

  10. preeti tailor said,

    अगस्त 1, 2009 at 7:53 पूर्वाह्न

    duniya ki nitiriti ko bakhubi thode shabd me bandh diya hai …sundar bhav abhivyakti …

  11. अगस्त 1, 2009 at 11:03 पूर्वाह्न

    याद ही नही के रूबरू हुए कभी
    याद सा दिल में मचल गया कोई
    बहुत खूब,

  12. अगस्त 2, 2009 at 4:41 पूर्वाह्न

    याद ही नही के रूबरू हुए कभी
    याद सा दिल में मचल गया कोई
    सुंदर ।

  13. अगस्त 2, 2009 at 4:45 पूर्वाह्न

    अच्छा , बहुत अच्छा लिखा है ।

  14. Shrddha said,

    अगस्त 2, 2009 at 6:34 पूर्वाह्न

    bahut sunder bhaavnayen

  15. अगस्त 2, 2009 at 12:46 अपराह्न

    महक जी, आपकी इस कविता पर यह पंक्तियां कहने का दिल करता है।
    दीपक भारतदीप
    ————-
    यादों में जो बसता है
    उसका नाम जुबां से बयां कहां होता है।

    नजर से हों कितना भी दूर
    दिलबर के पास होने का अहसास होता है

    आंखों में बसा दिखता है यह पूरा जमाना
    पर ख्याल में जो, बसा वही दिल के पास होता है।

  16. Neeraj Kumar said,

    अगस्त 2, 2009 at 3:13 अपराह्न

    Mahek,
    Your she’rs are real and sweet.

  17. Bhoopesh Gupta said,

    अगस्त 3, 2009 at 7:28 पूर्वाह्न

    मिले भी नहीं, सूना भी नहीं था कभी,
    रास्ते में थी ‘महक’ यूं ही पढ़ गया कोई.

    सचमुच अच्छा लिखती हैं आप. यदि हो सके तो जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों पर भी कुछ लिखें. शैली अच्छी है.

  18. अगस्त 3, 2009 at 7:32 पूर्वाह्न

    मिले भी नहीं, सूना भी नहीं था कभी,
    रास्ते में थी ‘महक’ यूं ही पढ़ गया कोई.

  19. nirmla said,

    अगस्त 3, 2009 at 1:57 अपराह्न

    बहुत खूबसूरती से बात कही है बहुत खूब लिखती हैं आप शुभकामनायें

  20. Mahfooz ali said,

    अगस्त 4, 2009 at 11:06 पूर्वाह्न

    याद ही नही के रूबरू हुए कभी
    याद सा दिल में मचल गया कोई

    yeh lines dil ko chhoo gayin…………

    ati sunder………..

    n thank u for raising up my morale by commenting ov my poem…………

    Regards……….

  21. Rohit Jain said,

    अगस्त 7, 2009 at 4:24 पूर्वाह्न

    राह में यूही मिल गया कोई
    वक़्त में कितना बदल गया कोई

    सच ही है…. लोग सचमुच बदल जाते हैं…

    एक शेर मुझे भी याद आया-

    आँखों का रंग बात का लहज़ा बदल गया
    वो शख़्स एक रात में कितना बदल गया

    खूबसूरत रचना…

  22. vijay said,

    अगस्त 7, 2009 at 9:45 पूर्वाह्न

    mehak , aapki ye post padhkar man ruk gaya hai ji .. kitni saari sanvedaanaye hai ….

    regards

    vijay
    please read my new poem ” झील” on http://www.poemsofvijay.blogspot.com

  23. Mahfooz said,

    अगस्त 7, 2009 at 6:47 अपराह्न

    m thankful to u for ur nice comment…..

    I hv scribbled a new poem …… need ur view(s)…..
    \
    \\
    \
    \
    \
    \

    Regards

  24. अगस्त 8, 2009 at 4:45 पूर्वाह्न

    Hmmm….nice one!

    Aapki is poem se ek gana yaad aa gayi. from movie Pakeezah….chalte chalte yun hi koi mil gaya tha…

  25. अगस्त 9, 2009 at 7:56 पूर्वाह्न

    लाजबाव रचना.आभार.

  26. alpana verma said,

    अगस्त 10, 2009 at 10:30 पूर्वाह्न

    नज़दीक से गुज़रे, पहचान न पाए
    अनजान सा करीब से निकल गया कोई

    waah waah waah! Mahak Kya baat hai…

    teeno hi sher bahut achche lage…

  27. Shashwat said,

    सितम्बर 30, 2009 at 11:20 पूर्वाह्न

    याद सा दिल में मचल गया कोई

    bahut khoob ji.

  28. अमीर said,

    जून 13, 2011 at 6:01 अपराह्न

    यादो के सागर से आखे भर आ जाती है


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: