मौत की दुल्हन का भी स्वयंवर होता है

आधी रात के उपर हुआ है | अब भोर ही होनेवाली है समझो | मन सोने को तैयार नही |
उसके अंदर देशभक्ति का जज़्बा उमड़ रहा है | स्वतंत्रता दिवस है न,इस लिए | पूरे साल
खयाल नही आता अपने देश का उसे | बहुत स्वार्थी है वो | बस देशभक्ति के गीत गाता है |
एक दो नारे लगा लो ,हो गया उसका कर्तव्य , जिमेदारी खतम | देश में , सरकार में,
कितनी खामियाँ है ,ये उसको मालूम , गाली देनो को हमेशा अग्रेसर | खुद कुछ बदलने की
हिम्मत कहा उसमें | अपनी जान से बहुत इश्क़ है मन को | मरने से,चोट खाने से डरता है,
डरपोक कही का | अपने खून का एक कतरा भी बहा , तो आँसू निकल आते है |

वो लोग कौनसे मिट्टी के बने होते है , जो अपनी जान सरहदों पर हसके कुर्बान करते है |
सालों साल,हर दिंन ,हर लम्हा ज़िंदगी का देश के लिए ही जीते है , शहीद होना अपनी
शान समझते है | जिन्हे अपने परिवार से, दूसरों के परिवार की फिक्र ज्यादा होती है |
जिनके लहू की हर बूँद बस देश के लिए समर्पित होती है | क्या उनका कोई मन नही होता ?
क्या उनकी ख्वाहिशे हमसे अलग होती है ?

हमारा जो मन है, बहुत आदर करता है उनकी | ओ ठंड में ,गर्मी में ,सरहदों पर सुरक्षा करते है |
उनकी वजह से ही तो ,मन आज़ादी की सांस लेता है |

मगर उनके मन को हमारा मन कभी समझ न पाया | कैसे करते होंगे वो ये सब | कितनी भी सलामी दे,
शुकराना अदा करे कम है |

अभी के पिक्चर देख आ रहे है | नाम याद नही | एक डायलॉग दिल तक उतर सा गया |
मौत की दुल्हन का भी स्वयंवर होता है |  वो अपने साथ   खूबसूरत   से खूबसूरत जवान लेके जाती  है |
मगर मौत का ये स्वयंवर सरहदों पर इंसान रचता ही क्यूँ है?

22 टिप्पणियाँ

  1. M Verma said,

    अगस्त 14, 2009 at 11:20 अपराह्न

    मेरा भी सलाम शामिल कर ले

  2. विनय said,

    अगस्त 15, 2009 at 12:20 पूर्वाह्न

    स्वतंत्रा दिवस जी हार्दिक शुभकामनाएँ

  3. अगस्त 15, 2009 at 2:38 पूर्वाह्न

    अब वो ज़ज़्बात कहाँ रहे… न केवल इस विशेष दिन में बल्कि सभी तरह में….
    फादर्स डे, मदर्स दे, टीचर्स डे….. न जाने कितने दिवस मनाये जाते हैं…
    वो भी मात्र एक दिन के लिए… बाकी सब दिन की छुट्टी… शायद समय नहीं है इन सब के लिए य फिर हमारी संस्कृति का हिस्सा बन गई है ….

    स्वतंत्रा दिवस हार्दिक शुभकामनाएँ
    जय हिन्द..

  4. Syed Akbar said,

    अगस्त 15, 2009 at 3:13 पूर्वाह्न

    मौत का ये स्वयंवर सरहदों पर इंसान रचता ही क्यूँ है?

    सवाल जायज़ है, पर क्या जवाब भी किसी के पास है ?

  5. Tosha said,

    अगस्त 15, 2009 at 3:23 पूर्वाह्न

    उच्च विचार!!

  6. अगस्त 15, 2009 at 3:43 पूर्वाह्न

    मौत का ये स्वयंवर सरहदों पर इंसान रचता ही क्यूँ है?

    आपने यक्ष प्रश्न खडा किया है. जवाब सायद सब जानते हैं पर किसी भी सभ्यता ने आज तक इसका उत्तर नही दिया. जिस रोज इसका उत्तर कोई देदेगा यह स्वयंबर बंद हो जायेंगे.

    स्वतंत्रता दिवस की घणी रामराम.

  7. om arya said,

    अगस्त 15, 2009 at 4:50 पूर्वाह्न

    bahut hi waazib sawaal hai …………..ek samwedanshil jankari dene ke liye shukriya ……………..

  8. alpana verma said,

    अगस्त 15, 2009 at 5:35 पूर्वाह्न

    sahi sochti hain aap.
    ham sab bhi un veeron ko naman karte hain.

    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

  9. kshama said,

    अगस्त 15, 2009 at 6:06 पूर्वाह्न

    केवल सरहदों पे नही ..कई शहादतें , सरहद के भीतर होती हैं ..arrmy के b-निस्बत दस गुना अधिक लोग पुलिस के मारे गए हैं ,आज़ादी के बाद से ..! लेकिन ,उनके बारेमे किसे पता ?

    जब BSF के सिपाही( para military force कहलाता है), चीनी लश्कर के द्वारा मरे गए,९ सन १९६२ में ),तबसे ‘स्मारक दिवस’ मनाया जाता है..अक्टूबर में..कहाँ हमारी जनता को ख़बर है इस बातकी ? हमारी अर्न्तगत सुरक्षा, या जब युद्ध नही होता, तब सरहदों की सुरक्षा BSF के तहत होती है..जो पुलिस का एक विभाग है..ये लोग रोज़ाना जान गवाँते हैं..!

    “मेरी जान रहे ना रहे,
    मेरी माता के सर पे ताज रहे”

    मुबारक हो!

  10. अगस्त 15, 2009 at 6:24 पूर्वाह्न

    स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ!

  11. P.C.Godiyal said,

    अगस्त 15, 2009 at 7:22 पूर्वाह्न

    उनको नमन और आपको स्वतंत्रता दिवस की सुभकामनाए !

  12. रचना said,

    अगस्त 15, 2009 at 8:05 पूर्वाह्न

    survival of the fittest apply karo

  13. अगस्त 15, 2009 at 1:22 अपराह्न

    मौत का ये स्वयंवर सरहदों पर इंसान रचता ही क्यूँ है?

    मनुष्य लगता है अभी भी अपने जानवर होने की जडों को काटना नहीं चाहता है.

  14. rashmi prabha said,

    अगस्त 15, 2009 at 2:51 अपराह्न

    कितनी भी सलामी दे,
    शुकराना अदा करे कम है |उनकी वजह से ही तो ,मन आज़ादी की सांस लेता है |
    jai hind

  15. Urmi said,

    अगस्त 15, 2009 at 4:07 अपराह्न

    वाह बहुत बढ़िया लिखा है आपने! स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

  16. ramadwivedi said,

    अगस्त 15, 2009 at 4:15 अपराह्न

    यूं तो प्रहरी से खड़े हैं ये हिमालय हैं बड़े।
    जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े॥

    शब्द गा सकते नहीं तेरे जीवन की कहानी,
    देश के हित झोंक दी है,तूने पूरी ज़िन्दगानी,
    देश का जन-जन रिणी है,छांव में जो तेरी पले…
    जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े।

    तुझसे ही तो यहां की हर कली मुस्कायेगी,
    तेरे बिन तो यहां की हर गली सो जायेगी,
    तुम नहीं तो हम नहीं,तुम हर दुआओं से बड़े…
    जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े।

    जल-थल-नभ में तेरा रुतबा अरु तेरी ही शान है,
    तुझसे अपनी आबरू है, अरु तुम्हीं से आन है,
    तुम समन्दर अरु धरा,आकाश से भी तुम बड़े…..
    जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े।

    यूं तो प्यारा झंडा हमारा झुकता नहीं है यह कभी,
    पर तेरे सम्मान में झुक जाता है यह हर कहीं,
    करते नमन, शत-शत नमन,हर सांस में तू ही चले…
    जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े।

    स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ

    डा. रमा द्विवेदी

  17. preeti tailor said,

    अगस्त 16, 2009 at 3:56 पूर्वाह्न

    ye post main samrpit karti hun hamare mahan bharat ke sattalolup rajkarniyon ko …ki bharat ka ek adad nagrik jo soch raha hai vo jab aap sochoge to jaroor badlegi bharat ki shakl …….bas ye z catagory ki surakshakavach hatakar ghumo …ham par pahli baar thoda sa sahi yakin aa sakta hai …
    salam un javanonko ….uske parivar ko …
    aur aapko jo aaj itna satik soch rahi ho ….

  18. digamber said,

    अगस्त 16, 2009 at 6:58 पूर्वाह्न

    Bahoot hi maarmik lekhan ke saath uthaaya gaya jeevant prashn hai aapka…… par sadiyon se ye hotaa aya hai…….insaan ki pyaas kabhi bujhti nahi ……..

    Lajawaab likha hai aapne

  19. अगस्त 19, 2009 at 5:37 अपराह्न

    आज जाने कितने दिनों बाद वापस आया आपके ब्लौग पर…बीच में कहीं लिंक गुम हो गया था ब्लौग का पृष्ठ बदलने के क्रम में।

    इस पोस्ट की भावनाओं को सलाम !

  20. rohit said,

    अगस्त 19, 2009 at 8:46 अपराह्न

    hi mehak…jitni shbhyat purnai..sawal uttna hi bada…..is svembher me jane ke liye har jawan uttawla hota hai….sundri veero ka hi alligan karti hai…

    kash hum bhi jaa pate….

    rohit

  21. Rewa Smriti said,

    अगस्त 23, 2009 at 7:27 पूर्वाह्न

    मगर मौत का ये स्वयंवर सरहदों पर इंसान रचता ही क्यूँ है?…Taki hamare deshvasi shakun ki neend so sake…

  22. अगस्त 27, 2009 at 3:19 पूर्वाह्न

    समझ बूझ कर इन्सान ये मौत के खेल खेलता है और मौत की दुल्हन चुन चुन कर सजीले जवानों को ले जाती है ।


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