बहुत नाइंसाफी हुई है..

गली के मोड़ से घूमते ही छोटा सा शॉपिंग कॉंप्लेक्स है | बरसात के सुहाने दिन और गाड़े पर मिलते भुट्टों की खुशबू |
कोई पगला मन ही होगा जिसको भुट्टे खाने की लालसा न हो | भुट्टे भी ऐसे , रसीले, एक एक दाना जैसे गहने में
करीने से मोती जड़े हो | जब भूनकर ,नमक , नींबू से सजता है तो और भी चमक आ जाती है उसमें |

सारे बच्चे , बूढ़े ,जवान जहान लोग कित्ते चाव से खाते है | रसीला स्वाद उनकी आँखों से टपकता है | हमे तो तब वो लोग
दुनिया के सबसे अमीर लोग लगते है | और एक हम है , बहुत नाइंसाफी हुई है हमारे साथ | भुट्टे का स्वाद बस हमारे
नाक से मन तक पहुँच पाता है | जरा थोडा आधे तक भी भुट्टा चख ले , पेट दर्द से करहाने लगता है | न जाने कौन
दुश्मनी है भुट्टे से उसकी | पूरा बरसात का मौसम जाने को है अब | तरस गये एक भुट्टा खाने वास्ते | हम बस
मक्खी की तरह गाड़े के आजू बाजू भिनभीनाते रह जाते है |

डर भी लगता है कभी गाड़ेवाला हाट हुत करके भगा न दे | कभी तो ऐसा लगता है,सारे भुट्टा खानेवाले लोग
हमे देख हंस रहे है, के देखो जी , ये भुट्टा नही न खा सकते , इनसे गरीब कोई है न जहाँ में |

हर बरसात बहुत सी खुशनुमा यादे दे जाती है, और संग दर्द-ए- भुट्टा भी |

हे ईश्वर ऐसी नाइंसाफी किसी और के साथ कोई भी जनम में न करियो जी आगे से |

15 टिप्पणियाँ

  1. kshama said,

    अगस्त 29, 2009 at 6:26 अपराह्न

    Kaisa chhoti chhoti khushiyon ke leye man taras jata hai…!

  2. अगस्त 29, 2009 at 7:10 अपराह्न

    सब कुछ होते हुए भी आँखों के सामने एक छोटी सी चीज़ के लिए इन्सान कितना लाचार हो जाता है, कैसी विडम्बना है! लाचारी जीवन का अंग है. हर व्यक्ति कहीं न कहीं, किसी न किसी कारण से एक छोटी सी चीज़ के लिए तरसता है.
    ‘भुट्टे भी ऐसे , रसीले, एक एक दाना जैसे गहने में
    करीने से मोती जड़े हो | जब भूनकर ,नमक , नींबू से सजता है तो और भी चमक आ जाती है उसमें |’ मुंह में पानी आगया. मेरी भी लाचारी है – मेरे इलाके में तो इस तरह से भुट्टा मिलना नामुमकिन ही समझो.
    आपका यह लेख बहुत सुन्दर है और अंतिम पंक्ति तो बहुत ही अच्छी लगी.
    महावीर
    manthan

  3. अगस्त 29, 2009 at 7:59 अपराह्न

    दर्द-ए- भुट्टा -दास्तां-ए-महक!! बहुत दर्दीली!! हाय!!
    इलाज काहे नहीं कराये?
    🙂

    बेहतरीन लेखन!

  4. M Verma said,

    अगस्त 29, 2009 at 10:37 अपराह्न

    मै तो पेट दर्द की हद तक भुट्टा खाने का आदी हूँ. पेट दर्द भी अगले दिन फिर भुट्टा खाकर ही ठीक करता हूँ.
    बहुत खूबसूरत लेखन

  5. shyamalsuman said,

    अगस्त 30, 2009 at 2:17 पूर्वाह्न

    आपने भुट्टा आज ही खाने को विवश कर दिया महक जी।

  6. om arya said,

    अगस्त 30, 2009 at 5:55 पूर्वाह्न

    हाय……. और क्या कहे……..

  7. अगस्त 30, 2009 at 8:27 पूर्वाह्न

    ‘भुट्टे न खा पाने की मजबूरी,सही कहा महक जी, दर्द-ए- भुट्टा,मॆ भी इस साल पेट दर्द से
    के कारण दूर हूं इसके स्वाद से

  8. digamber said,

    अगस्त 30, 2009 at 1:16 अपराह्न

    AAPNE APNI MAJBOORI KO BHI LAJAWAAB RANG MEIN PESH KIYA HAI …… BAHOOT HI SUNDAR VARNAN PAR DARD KE SAATH …..

  9. मीनाक्षी said,

    अगस्त 30, 2009 at 3:43 अपराह्न

    भुट्टा खाने के लिए हम तरस रहे थे..इस लेख ने याद और ताज़ा कर दी… बेहद खूबसूरत अन्दाज़ में दर्दे भुट्टा बयाँ किया…

  10. अगस्त 30, 2009 at 4:22 अपराह्न

    .
    .
    .
    अच्छा याद दिलाया आपने,
    अभी जाकर खाता हूँ…इस सीजन का मेरा पहला भुट्टा ।

  11. अगस्त 30, 2009 at 4:59 अपराह्न

    अच्छा याद दिलाया आपने। कल ही कचहरी चौराहे से मंगाता हूँ भुट्टा। भुट्टे का आनन्द तो गाँव में जाकर खेत में ही होरहा लगाने पर आता है। अब वह मजा शहर में कहाँ।

    और हाँ, हमें आपसे पूरी सहानुभूति है। च्च च्च च्च…

  12. rohit said,

    सितम्बर 2, 2009 at 11:36 अपराह्न

    mehak

    bhutta khana sahi kahu aajkal time hi nahi mila..or bhttawala milta bhi nahi aaspaass….lagta hai ki khud hi khaa ke pakana padega….had hai yaarr…….

  13. Rewa Smriti said,

    सितम्बर 5, 2009 at 4:43 पूर्वाह्न

    Hmmm….i love bhutta with lemon and salt..🙂

  14. जून 20, 2010 at 10:40 पूर्वाह्न

    जिन्दा लोगों की तलाश!
    मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

    काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
    =0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=

    सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

    हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

    इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

    अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

    आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

    शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

    सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

    जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

    (सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
    राष्ट्रीय अध्यक्ष
    भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
    7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
    फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666

    E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: