तुम कहती रहो

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तुम कहती रहो , हम निहारते रहे
साथ पल यू ही गुज़ारते रहे

शमा की जरा सी रौशनी में बैठे
घूंघराली लट गालों पे सवारते रहे

बीच में आए कुछ खामोश लम्हात्
निगाहों से जज़्बात दुलारते रहे

कही आहट हुई ,हड़बड़ा के जागे नींद से
तुम ख्वाब से ओझल , हम पुकारते रहे..

17 टिप्पणियाँ

  1. अगस्त 30, 2009 at 4:56 अपराह्न

    बीच में आए कुछ खामोश लम्हात्
    निगाहों से जज़्बात दुलारते रहे.
    Bahut sunder, komal jajbat.

  2. अगस्त 30, 2009 at 5:21 अपराह्न

    तुम कहती रहो , हम निहारते रहे
    साथ पल यू ही गुज़ारते रहे

    –आह!! वाह!! बेहद खूबसूरत!!

  3. Mahfooz said,

    अगस्त 30, 2009 at 6:37 अपराह्न

    कही आहट हुई ,हड़बड़ा के जागे नींद से
    तुम ख्वाब से ओझल , हम पुकारते रहे..

    baht sunder……. hum pukaarte rahe…….

  4. Navnit Nirav said,

    अगस्त 30, 2009 at 7:41 अपराह्न

    chhoti magar payari si kavita….pasand aayi.

  5. Urmi said,

    अगस्त 31, 2009 at 12:48 पूर्वाह्न

    बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण कविता लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है !

  6. vani geet said,

    अगस्त 31, 2009 at 3:22 पूर्वाह्न

    बेहतरीन कविता ..!!

  7. alpana said,

    अगस्त 31, 2009 at 4:06 पूर्वाह्न

    aise hi mahak tum likhti raho,
    aur ham padhte rahen..

    teesra sher bahut achchha hai.

  8. saif. said,

    अगस्त 31, 2009 at 5:17 पूर्वाह्न

    बहुत ही खूबसूरत लिखा है आपने…
    वाह वाह करने का मन कर रहा है…

  9. अगस्त 31, 2009 at 5:28 पूर्वाह्न

    कही आहट हुई ,हड़बड़ा के जागे नींद से
    तुम ख्वाब से ओझल , हम पुकारते रहे..

    बहुत खूबसूरत. शुभकामनाएं.

    रामराम.

  10. अगस्त 31, 2009 at 6:31 पूर्वाह्न

    बहुत ही सुन्दर भाव……………..

  11. digamber said,

    अगस्त 31, 2009 at 6:47 पूर्वाह्न

    कही आहट हुई ,हड़बड़ा के जागे नींद से
    तुम ख्वाब से ओझल , हम पुकारते रहे.

    सच में ऐसे khwaab जब टूट जाते है मन करता है …….. बस वो अब hakeekat में साथ aa jaayen ………..

  12. Razia mirza said,

    सितम्बर 1, 2009 at 4:12 पूर्वाह्न

    कही आहट हुई ,हड़बड़ा के जागे नींद से
    तुम ख्वाब से ओझल , हम पुकारते रहे..
    अरे …. ये क्या हो गया। बडा खुबसुरत अंदाज़॥

  13. rohit said,

    सितम्बर 2, 2009 at 11:41 अपराह्न

    Mehak

    Yaar tum kaha se alfaz chun ke laati ho…..dard bhi de jaati hai yaar.

    शमा की जरा सी रौशनी में बैठे
    घूंघराली लट गालों पे सवारते रहे

    yaha to lato wali hi nahi rahi …..saware to kia………..

    rohit

  14. Rewa Smriti said,

    सितम्बर 5, 2009 at 4:42 पूर्वाह्न

    Sunder….Pukarta chala gaya….

  15. subhash said,

    सितम्बर 11, 2009 at 6:32 पूर्वाह्न

    तुम कहती रहो , हम निहारते रहे
    साथ पल यू ही गुज़ारते रहे

    शमा की जरा सी रौशनी में बैठे
    घूंघराली लट गालों पे सवारते रहे

    बीच में आए कुछ खामोश लम्हात्
    निगाहों से जज़्बात दुलारते रहे

    कही आहट हुई ,हड़बड़ा के जागे नींद से
    तुम ख्वाब से ओझल , हम पुकारते रहे..


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