ए फिरंगी

कुछ दिन पहले टीवी पर एक फिल्म देखी , सज़ा-ए-कालापानी , शायद उस वक़्त की थी जब वीर सावरकर जी भी वहा
रखे गये थे | फिल्म की कहानी सावरकर जी के इर्द गिर्द नही थी , किसी और क्रांतिकारी के उपर थी | वहा सजा परस्त
लोग कैसे भागने की कोशिशे करते है , और फिर पकड़े जाने पर मिलनेवाली भयानक सज़ा | देखकर ही दिल दहल जाता है |
किताबों में सिर्फ पढ़ा था , कालापानी की खतरनाक जगह के बारे में | मगर फिल्म देखने के बाद पता चला ,वो दर्द क्या होता होगा |

कोडों से मारना, बर्फ की सिली पर सुलाना ये शायद आम सज़ा थी वीर क्रांतिकारियों के लिए | फिल्म में एकठा अनेक
लोगों को मार दिया गया, एक ही चिता में सब को जलाया गया,सडी हुई लाशे भी भारतीयों से उठवाई गयी | गरम गरम
इस्त्री पीठ पर रखी गयी | और इतना कुछ दर्दनाक के लिखा भी नही जा रहा | आधी फ्लिम आँखें बंद करके देखी |

आज के युग में जब भारत अनेको मोडर्न टेक्नोलॉजी से युक्त है , अक्सर हम दोस्तों में बैठे बैठे कह देते, देखो अगर
अंग्रेज़ हम पर राज नही करते तो शायद भारत अब भी टुकड़ो में बटा देश होता,अलग अलग राज्य लिए | माना के
अंग्रेज़ों ने हम पर बहुत जुल्म किए पर भारतको संघटित किया,यहा बहुत सारी सुविधाए बनाई | देखो कुछ होता
है अच्छे के लिए | कुछ पाने के लिए कुर्बानिया देनी ही पड़ती है | हमे अंग्रेज़ो से प्यार नही,मगर नफरत भी नही |
हमे इतिहास विषय में खास रुचि भी न थी , शायद इसलिए भी ऐसा सोच लिया होगा |

ये फिल्म देखने के बाद एहसास हुआ , बहुत बड़ी कुर्बानी चुकानी पड़ी | कितनी गलत सोच के शिकार हो जाते है कभी हम |
कुछ देर के लिए आग सी जल उठी थी दिल में , शायद वही आग महसूस करने की कोशिश ,आज़ादी के लिए तब देशवासियों
के दिल में दहक रही होगी | फिर वही कही दिल में दफ़न भी हो गयी |

ज़ी टीवी पर ही झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का सीरियल देखने मिला,नन्ही सी रानी का अंग्रेज़ों को पीटना , उन्ही के खेल
में उनको हराना , ये कहना के ” ए फिरंगी , ये हमारी धरती है,किस बात का टॅक्स भरे ,” और बहुत कुछ , दिल में दबी उस आग को कही सुकून सा दे गया | अनायास ही मन नन्ही रानी के साथ बोल पड़ा भाग फिरंगी भाग……

शायद तब जाकर दिल की राख कुछ ठंडी होने लगी है |

16 टिप्पणियाँ

  1. Urmi said,

    सितम्बर 14, 2009 at 5:37 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर ढंग से आपने फ़िल्म के बारे में प्रस्तुत किया है! मुझे तो इस फ़िल्म के बारे में कोई जानकारी नहीं थी! बहुत बढ़िया लगा !
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

  2. mithilesh said,

    सितम्बर 14, 2009 at 7:30 पूर्वाह्न

    हिन्दी हमे बचाना है, हम सबको बढते जाना है। हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई।

    http://hindisahityamanch.blogspot.com

    http://mithileshdubey.blogspot.com

  3. digamber said,

    सितम्बर 14, 2009 at 7:36 पूर्वाह्न

    आपने अच्छी तरह से अपनी बात को रखा है और में सहमत हूँ ………. जो लोग कहते हैं अगर अँगरेज़ नहीं होते तो हम तरक्की नहीं कर पाते, एक नहीं रह पाते वो गलत कहते हैं …………जो अंग्रेजों का विकास है वो तो देर सवेर आ ही जाता, पर जो नुक्सान उनके होने से हमारी विरासत का हुवा है शायद उसकी भरपाई कभी न हो सके ……….

  4. सितम्बर 14, 2009 at 8:23 पूर्वाह्न

    बहुत सशक्त प्रकाश डाला आपने उन शहीदों के प्रयासों पर. हमे हिंदी को भी पुर्ण आजादी दिलानी है, यह हमारा छोटा सा प्रयास है. आज सिर्फ़ हिंदी दिवस की बधाई देकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री ना समझे बल्कि हमे सतत इसको बढाने मे लगे रहना है.

    रामराम.

  5. rashmi prabha said,

    सितम्बर 14, 2009 at 8:40 पूर्वाह्न

    bhag firangi bhag……rongte khade ho jate hain aaj bhi

  6. preeti tailor said,

    सितम्बर 14, 2009 at 9:56 पूर्वाह्न

    shayad kal aur aaj me fark ye tha ki angrej ki di hui sahuliyat gulami ke lifaafe me band thi jo lifafa hamen aur kisi bhi sachche deshpremi ko nahin bhayega …dard aur dukh sabhi svatantra ho to use bhugtane ka maja bhi alag hi aata hai ….khair ab to ham desh ki taklif se door apni sahuliyat ki jyada sochne lage hai ….
    kyonki aazadi ke liye hamne khun nahin bahaya hai …..
    ek achchhi post …

  7. सितम्बर 14, 2009 at 11:26 पूर्वाह्न

    इन अग्रेजो ने हमारे लिये कुछ नही बनाया, जो बनाया सब अपनी सहुलियत के लिये बनाया, बल्कि कई जगह तो लिखा होता था कि कुत्ते ओर भारतीय का प्रवेश मना है, ओर हम आज इन्ही हरामियो की भाषा को अपनी मां से उपर मानते है, इन्ही कि नकल करते है….. हम हुइये ना गुलाम … हमारे बुजुर्गो की कुर्बानी तो बेकार हुयी ना.
    आप ने लेख इतना सुंदर लिखा कि अपने आप को रोक ना पाया.धन्यवाद

  8. mehek said,

    सितम्बर 14, 2009 at 1:05 अपराह्न

    shamaji ki tippani
    http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath

    ये फ़िल्म मैंने भी देखी थी( साथ एक ब्लॉगर , भी थीं) …अनेक कुर्बानियाँ दी गयीं …शायद एक बात कईयों को पता नही …सावरकर अंग्रेज़ी हुकूमत से माफी माँग, जेल से निकल आए थे ..महाराष्ट्र में इस बात की कोई पुश्टी नही करेगा …उनकी काव्य रचनाएँ बेहद सुंदर हैं ( ने मजशी ने ,परत मात्रु भूमीला ,सागर प्राण …: अए समंदर मुझे, तू ही अपनी मात्रु भूमी पे वापस ले जा…प्राण तड़प गए हैं…. इस रचना को एक आशा भासले छोड़, पूरे मंगेशकर परिवार ने गया है)। लेकिन गांधी , नेहरू , पटेल , आज़ाद …और अन्य सैकडों,…इनकी बराबरी शायद ही सावरकर कर सकते हैं ….ये ऐतिहासिक सच है ..

    shamaji humne aapki tippani yaha post kar di hai,shukran , sahi kaha apne sawarkar ji ka ne majasi ne parat matrubhumila geet bahut prasidh hai maharashtra mein.

  9. Rewa Smriti said,

    सितम्बर 14, 2009 at 3:59 अपराह्न

    Dear Mehek,

    You know what…I try to watch the serial Jhansi ki rani…at least on friday evening. Actually I got to chance to visit the place Bitthur and Ganga nadi recently, so it made me to remember the history. I am able to see whole the episode on friday evening. In fact, once I cried while watching the serial. I like it very much, and I liked your post very much.

    Akhir khub ladi mardani wo to jhansi wali rani thee!🙂

  10. सितम्बर 14, 2009 at 7:39 अपराह्न

    Ye film maine bhee dekhee hai koee 7-8 sal pehale ye kisi malyali krantikari ke bare mae hai. Unase bail kee tarah tel nikalwate aur barf kee silli par sulate Yah film patanahee kyun sare bharat me nahee dikhaee gaee wiase to ise tax free hona chahiye tha par humare desh men agar aapka nam gandhi ya Neheru nahee hai to aapk kaise desh bhakt ? Bhatiya jee se sahmat.

  11. सितम्बर 15, 2009 at 2:37 अपराह्न

    जानकारी का बहुत सुंदर प्रस्तुतीकरण

  12. सितम्बर 15, 2009 at 5:11 अपराह्न

    आप ने लेख बहुत सुंदर लिखा है
    बहुत बढ़िया लगा !

    धन्यवाद

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  13. सितम्बर 18, 2009 at 9:49 पूर्वाह्न

    फिल्म मैंने भी देखी है। कुछ ऐसे ही अहसासों से तब मैं भी गुजरा था।

  14. ALOK JAIN said,

    अक्टूबर 2, 2009 at 6:05 अपराह्न

    फिल्म मैंने भी देखी है। कुछ ऐसे ही अहसासों mere dil me aksar ate hai jab bhi me is taraha ki film dekhta hu mujhe bhi bahut gusa ata hai un angrejo pe ..
    इन अग्रेजो ने हमारे लिये कुछ नही बनाया, जो बनाया सब अपनी सहुलियत के लिये बनाया, बल्कि कई जगह तो लिखा होता था कि कुत्ते ओर भारतीय का प्रवेश मना है, ओर हम आज इन्ही हरामियो की भाषा को अपनी मां से उपर मानते है, इन्ही कि नकल करते है….. हम हुइये ना गुलाम … हमारे बुजुर्गो की कुर्बानी तो बेकार हुयी ना.
    जो लोग कहते हैं अगर अँगरेज़ नहीं होते तो हम तरक्की नहीं कर पाते, एक नहीं रह पाते वो गलत कहते हैं …………जो अंग्रेजों का विकास है वो तो देर सवेर आ ही जाता, पर जो नुक्सान उनके होने से हमारी विरासत का हुवा है शायद उसकी भरपाई कभी न हो सके ……….

  15. Kinjal A Sunva said,

    अप्रैल 29, 2010 at 9:08 पूर्वाह्न

    Bhag bhag re bhag firangi


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