सिटिवाला पड़ोसी

कुछ दिन पहले बाजुवाले बंगले में नये लोग आए रहने के लिए | अब जैसा की होता है , उनसे जान पहचान के लिए वक़्त लग ही गया | मगर आते जाते हमे जो बात खटकती थी वो
ये के , जब भी उनके घर के सामने से गुजरते , ओय होय करके कोई सिटी बजा देता |
अब इंसान सहे भी कितना ,तो हम पहुँच गये शिकायात करने |

पहले लगा शायद इनके बच्चे शरारत करते हो,खैर देखे माजरा क्या है | घर के मालकिन ने
जैसे ही दरवाज़ा खोला , हम आव देखे न ताव , सिद्धे तोप चला दी | के आपके यहा कोई रोज,
वो भी बार -2 सिट्टी मारता है ,कुछ समझाती क्यूँ नही ? राह चलते वालो को कितनी परेशानी होती है |
वो थी के हमे मुस्कुराते अंदर आने का निमंत्रण दे दिया | और हम थे के जवाब मिलने के इंतज़ार में जले ज़ा रहे थे |

अंदर जाने के बाद , घर मालकिन बोल पड़ी, हाँ जी हमारे घर का एक सदस्य ,हमेशा खिड़की से बाहर ताकझाक
करते हुए सिट्टी बजाता है | और उसे समझा के वो लोग भी हार चुके | हम पूछे के हम ही कुछ उपदेश के डोस
उन्हे पीला दे,शायद कुछ असर हो |

किसी को भी सुधारने का और नेक सलाह देने का मौका हम छोड़ना नही चाहते थे | जैसे ही अंदर के कमरे में
दाखिल हुए , क्या देखे, एक मिट्ठू मीया अपने पिंजरे में शान से बैठे , सिट्टी बजाए जा रहे है | सलाह देने का सारा मज़ा किरकिरा हो गया | लेकिन एक बात अच्छी हुई के हमे नये पड़ोसी से मुलाकात का मौकामिला
और मिट्ठू से दोस्ती हो गयी | बस पछी को पिंजड़े में बंद रखना हमे कभी रास नही आता |

बस कुछ दिनो से तपदिली इतनी हुई के अब,मिट्ठू मिया का पिंजडा पीछे की गॅलरी में रस्सी बांध के लटकाया
जाने लगा है | सो अब हम भी उसे अपने रसोई घर के खिड़की से देख सकते है | और राज़ की बात ये है के,जब
भी कोई कविता या शेर सूझता है,मिट्ठू को सुना देते है | वो जनाब सुनते भी है,गर्दन टेढ़ी करके , और क्या दाद मिलती
है, सिट्टी बजा के |
है किसी के पास ऐसा श्रोता , जो बिना माथे पे शिकन लाए कभी भी आपकी कविता,शेर सुने और हर बार सिट्टी बजाते के
वाह वाही करे |

10 टिप्पणियाँ

  1. Mahfooz said,

    अक्टूबर 2, 2009 at 6:40 अपराह्न

    hahahahahahahahaha……..chaliye achcha hua tota tha………

  2. kshama said,

    अक्टूबर 2, 2009 at 9:04 अपराह्न

    Bachpan me apnee ek rishte kee buako mere pariwaar ko batate suna ‘ladkon ne seetee bajayee,’….sabkee shaklen zara gambheer thee…maine bade bhole panse sawal kiya:
    “Kya wo seetee aapke kaan me bajate the?”
    Sab hans pade…mujhe badahee bura laga…samajh nahee paayee,ki, jab seetee inke kaanme nahee bajtee to inhen kya takleef hai?
    To tota to aapka dost hee nikla…!
    Rochak qissa sunaya…dua kartee hun,aapke aise sureele padosee bane rahen…seetiya bajate rahen!

  3. अक्टूबर 2, 2009 at 10:36 अपराह्न

    एक कवि आत्मा को और क्या चाहिये. उसे तो आप अपने घर ही ले आओ.🙂

  4. अक्टूबर 3, 2009 at 12:11 पूर्वाह्न

    वाह ! हम तो कुछ और ही समझ रहे थे ।
    श्रोता तो गजब का है – सुनता है सब कुछ सीटी बजा के !

  5. preeti tailor said,

    अक्टूबर 3, 2009 at 4:03 पूर्वाह्न

    bahut maza aaya sachmuch aaj ki baat main dam hai …..

  6. अक्टूबर 3, 2009 at 8:13 पूर्वाह्न

    बेचारा तोता….उसे कभी कभी कोई कहानी भी सुना दे, सीटी बजा के, यह ना हो कल से बो आप को कविता सुनानी शुरु कर दे
    बहुत मजे दार लगी आप की आज की पोस्ट
    धन्यवाद

  7. rashmi prabha said,

    अक्टूबर 3, 2009 at 10:21 पूर्वाह्न

    waah maza aa gaya……sach me koi har waqt sunnewala nahi milta

  8. अक्टूबर 3, 2009 at 10:42 पूर्वाह्न

    काश ये तोता मेरे ब्लाग पर भी हो आता🙂

  9. Shubhashish Pandey said,

    अक्टूबर 3, 2009 at 10:46 पूर्वाह्न

    ha ha ha
    khushkismat hain aap🙂

  10. लाल और बवाल said,

    अक्टूबर 3, 2009 at 5:31 अपराह्न

    बहुत ख़ूब अंदाज़ से बात कही आपने। हा हा । सीटी और तोते का क्या सुन्दर रिश्ता है एक बार फिर रीफ़्रैश हो गया। आणि तुमच्या मराठी ब्लॉग चाँदनी पण एकदम छान आहे। माझी शुभकामना त्याच्या साठी।


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