सुबह का कोहरा

खोल दो अपनी पंखुड़ियों को 
हौले हौले एक के बाद एक 
फैलाओ अपनी बाहें इतनी 
सारी कायनात भर लो 
आशाओं के ख्वाब सजने दो 
मन को नित नयी सी 
अपने वजूद की धुन रचने दो 
हक़ीकत के पराग कन 
सच बनकर खिलेंगी
सुबह का कोहरा छटते ही
ओस की बूंदे मिलेंगी |

17 टिप्पणियाँ

  1. Mahfooz said,

    नवम्बर 30, 2009 at 4:23 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर कविता …मन को मोह लिया…..

  2. संगीता पुरी said,

    नवम्बर 30, 2009 at 4:23 पूर्वाह्न

    सुबह का कोहरा छटते ही
    ओस की बूंदे मिलेंगी |

    एक सुंदर आशावादी रचना के लिए बधाई !!

  3. preeti tailor said,

    नवम्बर 30, 2009 at 4:55 पूर्वाह्न

    हक़ीकत के पराग कन
    सच बनकर खिलेंगी
    सुबह का कोहरा छटते ही
    ओस की बूंदे मिलेंगी |

    sundar ehsaas …

  4. Abyaz said,

    नवम्बर 30, 2009 at 5:07 पूर्वाह्न

    और शबनम की ये बूंदे.. एक ताज़गी का एहसास कराएंगीं, जिससे जिस्म का रोंया-रोंया कहेगा.. काश मैं भी शबनम की एक बूंद होता.. और किसी के नाज़ुक पैंरों के नीचे आने का एक मौका मुझे भी मिल पाता.. बहुत ख़ूब मज़ा आ गया…

  5. Alpana said,

    नवम्बर 30, 2009 at 6:01 पूर्वाह्न

    bahut hi khubsurat kavita hai..shabnam mein nahayee si..

  6. rashmi prabha said,

    नवम्बर 30, 2009 at 6:52 पूर्वाह्न

    और एक सुर हमारे अन्दर पनपने लगेंगे…..
    वाह

  7. digamber said,

    नवम्बर 30, 2009 at 7:18 पूर्वाह्न

    सुबह का कोहरा छटते ही
    ओस की बूंदे मिलेंगी …..

    लाजवाब लिखा है ……. सच कहा है दुख के बादल छाँटते है तो खुशियों का मौसम आता है ……. उम्दा रचना है …….

  8. नवम्बर 30, 2009 at 9:46 पूर्वाह्न

    बहुत खूबसूरत रचना. शुभकामनाएं.

    रामराम.

  9. neeraj1950 said,

    नवम्बर 30, 2009 at 10:01 पूर्वाह्न

    छोटे छोटे शब्दों में गहरी गहरी बातें…वाह…
    नीरज

  10. नवम्बर 30, 2009 at 12:18 अपराह्न

    अपने वजूद की धुन रचने दो
    हक़ीकत के पराग कन
    सच बनकर खिलेंगी
    सुबह का कोहरा छटते ही
    ओस की बूंदे मिलेंगी |
    महक जी बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है बधाई

  11. नवम्बर 30, 2009 at 2:42 अपराह्न

    उम्मीद के ख़्वाबों को अपने वज़ूद में समेटती बेहतर पंक्तियां…
    अच्छा लगा…..

  12. Kajal Kumar said,

    नवम्बर 30, 2009 at 4:17 अपराह्न

    अच्छी सोच है. उड़ान भरती हुई.

  13. sharad kokas said,

    नवम्बर 30, 2009 at 5:45 अपराह्न

    यह है आशावाद ..अद्भुत ।

  14. urmi said,

    दिसम्बर 2, 2009 at 12:40 पूर्वाह्न

    बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने ! हर एक पंक्तियाँ दिल को छू गई!

  15. Rewa Smriti said,

    दिसम्बर 3, 2009 at 4:10 अपराह्न

    सुबह का कोहरा छटते ही
    ओस की बूंदे मिलेंगी |

    Beautiful!

  16. rajeshwar said,

    दिसम्बर 9, 2009 at 3:56 पूर्वाह्न

    subah ke nazaro ko bahut salike se aapne shabdo me piroya ki maza aaa gaya.

    raj


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