सिटिवाला पड़ोसी -2

हमारे सिटिवाले पड़ोसी मिट्ठू मिया के बारे में हम पहले बता चुके है | वक़्त के साथ पहचान अब याराने में
बदल चुकी है | जब भी हम घर पर होते है, जनाब हमारे यहा आने की जिद्द करके चले आते है | खाना पीना,
कभी रात को सोना भी यही पर |

फिर आज कल हमारे शेर,कविता पर सिट्टी बजा कर दाद देना भी कम हो गया है | अब वही वही शेर,कविता भी
कोई कितनी बार सुने | आज कल उनके तारीफ में कसीदे पढ़ने पड़ते है |
मिट्ठू मिट्ठू पोपट, है बड़ा नटखट
पेरू खाए हरा,मिर्ची खाए लाल
झूले पर बैठे , करते धमाल
अब ये पंक्तियाँ दिन में ,रात में गानी पडतो है |

“म्याव” तो ऐसे कहते है,जैसे कोई बिल्ली ही बोल रही हो | बाकी दिन भर की बातें भी गबर गबर करके सुनाते
रहते है,आधी समझ आती है,आधी नही | जब पहली बार म्याव सुना तो लगा जैसे सच में बिली ही आ गयी |
हाथ का काम छोड़ दौड़े कही पंछी को खा ना ले | फिर पूछ ताछ करने पर पता चला के नन्हे जनाब ,किसी को
डराने के लिए म्याव कहते है |
कोई भी महरी काम करने आए, उन्हे ‘कामचोर’ कह देते है | सुना है घर के दादीजी को पहले आदत थी एक महरी को कामचोर
कहने की ,वही लफ्ज़ ,अब सब को दोहराते है | वैसे ही महरी के इतने नखरे , फिर उपर से ऐसा कौन सुने |
बहुत मिन्नते करके समझाना पड़ा , वरना तो एक दिन महरी काम छोड़ कर भाग जाने के फिराक में थी |

टीवी शुरू करते ही, सोनी चॅनेल लगाना होता है | सी .आय.डी मिट्ठू जी का पसंदीदा सीरियल | फिर ना किसी को न्यूज़
देखने देते है नही कोई और चॅनेल | मिट्ठू मिया की मालकिन दिन भर वही देखती है |
खाना बनते देखना भी बहुत भाता है.खास कर रोटियाँ | रोटी बनाने वाली मौसी से बेहद प्यार है उन्हे |

मिट्ठू मिया के घर में जीतने लोग है,सब के नाम बोल लेते है | हमारा नाम बोलने में बहुत परेशानी होती है |
जब भी कहे के हमारा नाम पुकारो,चिर चिरर शुरू | याने के बहुत मुश्किल है | उसका हल भी मिट्ठू जी ने
खुद ही निकाल लिया | और हमारा नया नामकरण कर दिया ‘मित्ति’ |

एक छोटे से पंछी को भी,हमारे जैसी ही बहुत सी भावनाये होती है , ये मिट्ठू के साथ रह के ही जान पाए |
बस एक ही है के हमारे डॉगी को लगने लगा है,उनका स्थान घर में कम हो रहा है | सो अब जो भी घर में काम पर से
आता है,सब के पास से दुलार कर लेते है |

ये बातें शायद कभी खतम नही होंगी , मगर हाँ बहुत सारे यादगार पल प्राणी,पंछी के साथ भी होते है ,ज़िंदगी में,
बस उन्हे समेटने की कोशिश भर की |

16 टिप्पणियाँ

  1. Mahfooz said,

    दिसम्बर 16, 2009 at 6:02 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छी और मनमोहक लगी यह पोस्ट…..

    बधाई….

  2. दिसम्बर 16, 2009 at 10:23 पूर्वाह्न

    महक जी, हमें आपसे एक शिकायत है। आपने सीटी वाले पड़ोसी की फोटो क्यों नहीं लगाई?
    आपके आत्मीयता भरे संस्मरण मन को छू गये।
    ——–
    छोटी सी गल्ती जो बडे़-बडे़ ब्लॉगर करते हैं।
    क्या अंतरिक्ष में झण्डे गाड़ेगा इसरो का यह मिशन?

  3. kshama said,

    दिसम्बर 16, 2009 at 10:23 पूर्वाह्न

    Badee pyaree post hai! Mitthu to laga jaise saamne ho!

  4. rashmi prabha said,

    दिसम्बर 16, 2009 at 10:25 पूर्वाह्न

    bahut hi achhi

  5. preeti tailor said,

    दिसम्बर 16, 2009 at 10:39 पूर्वाह्न

    bahut hi dilchasp lagi ye post ….panchhi ki avaj bhi har vakt har bhavnaoko vyakt karte alag alag nikalati hai ….
    mujhe bahut achchhi lagi ye post …

  6. दिसम्बर 16, 2009 at 11:00 पूर्वाह्न

    बढियां पक्षी संस्मरण -शुरू में तो मैंने सोचा की कोई ब्लॉगर तो नहीं जिसके बारे में आप कुछ कहती जा रही हैं !

  7. रंजन said,

    दिसम्बर 16, 2009 at 11:02 पूर्वाह्न

    अच्छा पडौसी है..

  8. Ashish said,

    दिसम्बर 16, 2009 at 11:03 पूर्वाह्न

    आपने मेरे मिठठूराम की याद दीला दी ! हमारा मिठ्ठुराम हमारे साथ १६ वर्ष तक रहा ! शरारती तो था ही, सीटी बजाने में एक्सपर्ट | आप किसी भी तरह की सीटी बजाये , दो बार सुनकर तीसरी बार वही सीटी आपको सुनाता था ! फ़ोन की घंटी बजाना आती थी उसे , जब हम सभी घर के बाहर लान में बैठे हो, और मिठठूराम को घर में छोड़ दिया, हीरो फ़ोन की घंटी बजाएगा | उसे मालूम था कि फ़ोन की घंटी सुनकर कोई ना कोई तो अन्दर आयेगा, वो उसके साथ बाहर आ जाएगा !
    मिठठूराम के साथ रहकर मैंने देखा था कि तोतो में इंसानी भावनाओ की समझ होती है ! उन्हें भी क्रोध प्यार लाड दिखाना आता है| वो भी घर के लोगो के नाम रख देते है | मिठठूराम घर के सभी लोगो के नाम तो लेता था, जिसके नाम लेने में परेशानी आती थी अपनी समझ से कोई शब्द से आवाज देता था ! गुस्सैल इतना कि देर से खाना मिलाने पर कटोरी बाहर फ़ेंक देगा ! अब उसको मना कर हाथो से खिलाओ तो खायेगा !
    जब हम हरे चने के बूट खाए तो उसे भी पूरा एक बूट चाहीये !
    उसने पिंजरे का दरवाजा खोलना भी सीखा लिया था ! जब हम खाना खाते थे, वहा भी पिंजरे से निकल हम लोगो की थाली में खायेगा ! जिसकी थाली में वहा खाना खाए वह परेशान ! मिठठूराम को चुन चुन कर खाने की आदत, जो पसंद वो अन्दर , जो ना पसनद उठाकर बाजू करो ! भले ही थाली के साझीदार को वह खाना हो !
    मिठ्ठुराम के हम लोगो को छोड़ कर जान्ने के बाद हमने और कोई प्राणी नहीं पाला !

  9. padmsingh said,

    दिसम्बर 16, 2009 at 3:46 अपराह्न

    mai naya blogger hun aur apne blog par hindi me type nahi kar paata. plz help me if u can.. my Blog Address- padmsingh.wordpress.com

  10. digamber said,

    दिसम्बर 17, 2009 at 2:35 अपराह्न

    आपका लेख पढ़ना बहुत अच्छा लगा …….. घर में रहने वाले जानवर, पंछी भी दिल में बस जाते हैं ……..

  11. दिसम्बर 17, 2009 at 3:36 अपराह्न

    बहुत रोचक पोस्ट है।अच्छी लगी।

  12. जनवरी 6, 2010 at 1:10 अपराह्न

    खूप छान पोस्ट . आम्ही एकजदा रुडकी ला गेलो होतो बहिणी कडे त्याच्या शेजा-यां कडे असा बोलणारा पोपट होता खूप बोलायचा . मिट्ठू मिट्ठू तर दिवस बर . स्कूल जा, असं मुलीना सांगायचा । ह्या पोस्ट नी त्याची खूप आठवण आली .

  13. psingh said,

    जनवरी 27, 2010 at 11:43 पूर्वाह्न

    सुन्दर पोस्ट
    बहुत बहुत आभार

  14. rohit said,

    फ़रवरी 10, 2010 at 9:50 अपराह्न

    महक …. मिठ्ठु मियां की बात पर काफी मजा आया…काफी पहले एक स्टोरी की थी . विदेश के मिठ्ठु मियां के अकेलेपन पर….हमारी स्टोरी देख कर हमारे एक जानकार ने हमें फोन किया और बुलाया अपनी समस्या का हल करने के लिए .. दरअसल हमारे जानकार के पास बेचारे मिठ्ठु मियां के साथ बतियाने का टाइम कम था…सो वो मिठ्ठु मियां बड़े चिड़चिड़े थे…ठीक स्टोरी वाले महाश्य की तरह….उसके बाद उन महाशय के साथ मिलकर जबतक मिठु मियां जी के लिए वेलेटाइन नहीं लाए तबतक उनका चिड़चिड़ापन दुर नहीं हुआ…..बताइए ये कोई बात हुई….अकेले थे वो. और परेड करा दी हमारी…

  15. rohit said,

    फ़रवरी 10, 2010 at 9:50 अपराह्न

    महक जी आपके ब्लाग पर काफी दिन बाद आना हुआ..मेरे ख्याल से कई महीने बाद…..इसके लिए क्षमाप्राथी हुं…..

    वैसे ये रीवा जी कहां खो गयीं आजकल .


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