बहुत खामोशियाँ बिखरी हुई

बहुत खामोशियाँ बिखरी हुई आसपास
दिल की धड़कन सुनाई ना दे
किस आवाज़ का आगाज़ 
ज़िंदगी को न मालूम
वो चुपचाप खड़ी है दरवाज़े पे……..

=======================
हम खुद गये थे
वो दीवार फांदकार
रिश्तों की पुरानी परतों पर्
नया मूलामा चढ़ाने
प्यार के चुने से
चिपकाए एहसास
रंगों का चुनाव सबका
अलग था मगर…………………

20 टिप्पणियाँ

  1. जून 21, 2010 at 6:38 अपराह्न

    बहुत दिनों के बाद आपको पढना अच्छा लगा…..

  2. Rohit Jain said,

    जून 22, 2010 at 8:27 पूर्वाह्न

    बहुत खूबसूरत

  3. harkirat heer said,

    जून 22, 2010 at 8:56 पूर्वाह्न

    बहुत खामोशियाँ बिखरी हुई आसपास
    दिल की धड़कन सुनाई ना दे
    किस आवाज़ का आगाज़
    ज़िंदगी को न मालूम
    वो चुपचाप खड़ी है दरवाज़े पे……..

    बहुत खूब ….!!

  4. जून 22, 2010 at 10:28 पूर्वाह्न

    बहुत खूब … ज़िंदगी इन खामोश आवाज़ों को सुन लेती है ….
    अच्छी रचना है बहुत ही …

  5. neelima garg said,

    जून 24, 2010 at 11:46 पूर्वाह्न

    so good…

  6. जून 24, 2010 at 1:48 अपराह्न

    बहुत अच्छी लगी कविता। बधाई

  7. abyaz said,

    जून 27, 2010 at 7:45 अपराह्न

    अरसे बाद आपके ब्लॉग पर आया हूं.. उम्दा कविता पढ़ने को मिली। महक जी रिश्तों में आई दरार को आज के दौर में पाटना बहुत मुश्किल हो चला है।

  8. mehek said,

    जून 28, 2010 at 8:12 पूर्वाह्न

    aap sabhi ka bahut shukran

  9. Asha said,

    जुलाई 12, 2010 at 2:03 पूर्वाह्न

    महक बहुत दिनों बाद आपके इस ब्लॉग पर आई । पीछे 2 महीनों से खूब घुमाई हो रही थी । जिंदगी के रंग सबके अपने अलग अलग होते हैं नये रंग नही चढा पयें तब भी झाड पोंछ कर चमकाते रहना जरूरी है । सुंदर रचना ।

  10. जुलाई 12, 2010 at 3:58 अपराह्न

    दोनों कविताएँ पसंद आई..
    खास लगी दूसरी कविता..

  11. जुलाई 13, 2010 at 4:15 अपराह्न

    Again beautiful lines….i ws spectator since long …!!!

    I enjoy reading !!!

  12. Poonam said,

    जुलाई 13, 2010 at 4:44 अपराह्न

    बहुत खामोशियाँ बिखरी हुई आसपास
    दिल की धड़कन सुनाई ना दे
    किस आवाज़ का आगाज़
    ज़िंदगी को न मालूम
    वो चुपचाप खड़ी है दरवाज़े पे
    bahut hi sashakt prastutikaran, mahak ji, bahut hi achcha lagapadh kar
    poonam…

  13. जुलाई 19, 2010 at 7:01 अपराह्न

    महक जी बहुत सुन्दर क्षणिकाएँ हैं

  14. vivek said,

    अगस्त 2, 2010 at 2:55 अपराह्न

    बहुत खामोशियाँ बिखरी हुई आसपास
    दिल की धड़कन सुनाई ना दे
    किस आवाज़ का आगाज़
    ज़िंदगी को न मालूम
    वो चुपचाप खड़ी है दरवाज़े पे……

    bahut sundar likhte hai aap!

  15. vivek said,

    अगस्त 2, 2010 at 2:55 अपराह्न

    bahut sundar likhte hai aap!

  16. rohit said,

    अगस्त 10, 2010 at 1:13 पूर्वाह्न

    वाह क्या नज्म है…..जिंदगी सही में दरवाजे पर ही होती है खड़ी ..बस जरा हमें उस से जाकर मिल लेना चाहिए…..

    पर आप हैं कहां पूरे दो महीने हो गए गायब हुए..सो सेड….

  17. rohit said,

    अगस्त 10, 2010 at 1:14 पूर्वाह्न

    अपने लिए नहीं कभी कभी पाठकों के लिए भी आना चाहिए अपने ही ब्लॉग पर …..

  18. vijay said,

    अगस्त 26, 2010 at 3:39 अपराह्न

    ab main kya kahun .. aapne to bhaavnao ko is khoobsurati se shabdo ka jaama pahnaaya hai ki , main to khamosh hi ho gaya ..

    BADHAI

    VIJAY
    आपसे निवेदन है की आप मेरी नयी कविता ” मोरे सजनवा” जरुर पढ़े और अपनी अमूल्य राय देवे…
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html


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