झर झर शाख से

झर झर शाख से झरती हुई पत्तियाँ
हर एक पे तेरा नाम लिखने की कोशिश करती हूँ

और तुम हसकर इसे हमारा बचपना कहते हो…..
————————————————————–
तोड़ी थी अनगिनत पत्तियाँ एक एक कर
उंगलियाँ भी दर्द से करहाती

तेरे प्यार की गहराई को नाप न सके मगर …….

7 टिप्पणियाँ

  1. काजल कुमार said,

    अप्रैल 3, 2011 at 7:54 पूर्वाह्न

    🙂

  2. xheavenlyx said,

    अप्रैल 3, 2011 at 2:04 अपराह्न

    saral man ke sundar bhav …. prem ki gehrayee kahaan koyee naap sakaa hai.

  3. digamber said,

    अप्रैल 4, 2011 at 9:50 पूर्वाह्न

    झर झर शाख से झरती हुई पत्तियाँ
    हर एक पे तेरा नाम लिखने की कोशिश करती हूँ

    और तुम हसकर इसे हमारा बचपना कहते हो…..

    उफ्फ … कतल लिखा है …

  4. अप्रैल 7, 2011 at 7:07 पूर्वाह्न

    khub gahri soch ….

  5. Rewa Smriti said,

    अप्रैल 27, 2011 at 1:04 अपराह्न

    तेरे प्यार की गहराई को नाप न सके मगर …….

    Kash, pyar aur jajbat ki gahrai ko bhi naapne wala koi maschine hua hota…

  6. vijay said,

    अगस्त 18, 2011 at 8:52 पूर्वाह्न

    बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आया हूँ . और इस रचना को पढकर मन भावुक हो गया है .. बहुत अच्छे शब्द .. बहुत अच्छे भाव.. यादो को हवा देते हुए.. बधाई हो ..

    आभार
    विजय
    ———–
    कृपया मेरी नयी कविता ” फूल, चाय और बारिश ” को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html


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