यादों का छल्ला

चांदनी सुना रही कुछ अनकहे से राज़
जो तेरे मेरे बीच में सजते थे बन साज़

कैसे कहूं पवन से ना छेड़े वही गुंजन
ना समझू कुछ जलता दिल में या उठती ठंडी सिरहन

चाँद भी नही खेलता बादलों संग आँख मिचोली
कहता नटखट कोई नही मैं तेरा हमजोली

इन बातों से खनकता तेरी यादों का छल्ला रुनझुन
फिर उठती अनगिनत लहरें ,विचलित होता ये मन……

7 टिप्पणियाँ

  1. MsM said,

    नवम्बर 20, 2011 at 6:21 पूर्वाह्न

    इन बातों से खनकता तेरी यादों का छल्ला रुनझुन
    फिर उठती अनगिनत लहरें ,विचलित होता ये मन……

  2. kshama said,

    नवम्बर 20, 2011 at 6:22 पूर्वाह्न

    इन बातों से खनकता तेरी यादों का छल्ला रुनझुन
    फिर उठती अनगिनत लहरें ,विचलित होता ये मन……
    Behad sundar!

  3. riya said,

    नवम्बर 20, 2011 at 5:45 अपराह्न

    bahut sundar
    i love to spend time on blog or sites like this ,
    thanks for serving us a very interesting content .

  4. Neeraj said,

    नवम्बर 24, 2011 at 7:20 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छी रचना…बधाई स्वीकारें

    नीरज

  5. नवम्बर 26, 2011 at 8:46 पूर्वाह्न

    यादों का छल्ला रुन झुन, क्या बात है मेहेक ।
    यादों को लेकर काफी सुंदर कविताएं निकल कर आई हैं

  6. दिसम्बर 11, 2011 at 7:24 अपराह्न

    बहुत ही सुन्दर रचना.

  7. Rewa Smriti said,

    जनवरी 23, 2012 at 6:29 पूर्वाह्न

    चाँद भी नही खेलता बादलों संग आँख मिचोली
    कहता नटखट कोई नही मैं तेरा हमजोली

    Lovely dear!

    After a gap I am reading your lovely expression!


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