अमलतास के पुष्पित झूमर

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अमलतास के पुष्पित झूमर

ग्रीष्म ऋतु की खनकी पायल
गरम हवायें तनमन  घायल
तपती धरा,झुलसाती हर प्रहर
शाम सुहानी  या मीठी सहर
ज्वाला सी धग धगती दोपहर
सृष्टि पर जैसे टूटा कहर
राह पर मिल जाते हो तुम
लगते हो  सब से मनोहर
पीले सोनम से रंग सजे
अमलतास के पुष्पित झूमर
हरे पन्नो को त्याग  र 
ओढते हो ये लिबास
थकि आँखों को थोडासा हो
खुशनुमा सा हल्का एहसास
काया को नही मोहक सुगंध
जोड़े हो दिल से स्नेह बंध
खुद जले और बने दूसरे की छाया
वही बनता है तुमसा कुंदन
पास आकर तुम्हारे पग जाते ठहर
तुमसे सीखा है जीवन में
बनाना सयमि शीतल चंदन.

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