और कुछ भी नही

और कुछ भी नही

दर्पण में अपनी छवि देख रहे थे
देखा तेरा अक्स,और कुछ भी नही  |

जमाने के फसाने सुनने चाहे हमने
सुनी तेरी धड़कन,और कुछ भी नही |

खुदा से  गुनाहो की माफी माँगनी चाही
माँगा सिर्फ़ तुझे,और कुछ भी नही |

मुशायरे मे बैठे अपनी नज़्म भूल गये
याद रहे  बस तुम,और कुछ भी नही |

काग़ज़ कलम लेकर ग़ज़ल लिखनी चाही
एक  तेरा  नाम लिखा ,और कुछ भी नही |

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