कुछ कहना तो है

कुछ कहना तो है

निगाहे जब मिलती है निगाहो से तेरी
शर्मो हया की धुन्द रुखसते हो सारी
निगाहो से कुछ कहना तो है मगर
पलके झुक जाती है
साथ नही देती है |

चहेरे के सामने जब तेरा चहेरा है आता
मुस्कुराहटो के फूल ,तनमन से  बरसाता
मुस्कान से कुछ कहना तो है मगर
लब सील जाते है
साथ नही देते है |

हाथो में मेरे जब तेरा हाथ होता है
जज़्बात तुमसे कहने,ये दिल मचलता है
दिल से कुछ कहना तो है मगर
ज़बां लड़खड़ा जाती है
साथ नही देती है |

एक दिन तुमसे इज़हार करना तो है
गुलिस्ता-ए-इश्क़ अपना सवरना तो है
तुमसे कुछ कहना तो है मगर
धड़कने तेज हो जाती है
इश्क़ की धुन सुनती है |

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