खत लिखने की रस्म निभाई है

खत लिखने की रस्म

नयनो में ये घटा,आज फिर घिर आई है
खुशियों की बरसात बिन मौसम लाई है |

डाकिया कितने दिन बाद,दहलीज़ पर आया
दूर परदेस से, सजन का खत सन्देस लाया |

खत जब खोला तो, सारे गुलाब के फूल है
खत सिर्फ़ काग़ज़ नही,मेरे यारा का दिल है |

हर लफ्ज़ से उनका प्यार महकता है
दीदार-ए-इंतज़ार का गम छलकता है |

उनका खत पढ़ने में हम मसरूफ़ हो गये
याद करते वो अक्सर,हम महफूज़ हो गये |

जवाब-ए-तखलूस में हमने काग़ज़ कलम उठाया
कोरे पन्नो पर अपने अश्क का मोती बिछाया |

लिखे है हमने भी ,अपने दिल के सारे ज़ज़्बात
काटे है कैसे दिन और वो अकेली सुनी रात |

कभी ना कहना फिर, के हम हरजाई है
ये खत लिखने की रस्म,हमने भी निभाई है |

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