ग़ज़लो की दीवानी

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   ग़ज़लो की दीवानी

आज कल पग पग निशानी
मैं बस ग़ज़ल सोचती जाउ
किसी पल तुम देखो मुझको
मैं बस ग़ज़ल तलाशती पाउ |

ना जाने ये कैसा खुमार है
मुझे इससे कब इनकार है
ग़ज़ल  बन रहा मेरा जीवन 
मुझे इससे अब इकरार है |

जिस गली भी लगा शामियाना
तखलूस हो रही ग़ज़ल जहा पर
कही और ढूँढने की नही ज़रूरत
मुझे भी तुम पाओगे वहा पर |

दिल से सुनती हूँ ग़ज़ल को
दिल से अपनाती हर लफ्ज़ को
भारी उर्दू अल्फ़ाज़ जो ना समझू
दिल से कोई अर्थ लगाती उनको |

हम तो बस इतना ही जानते
शेर जोड़ कर ग़ज़ल है बुनते
काफिया,बहर,मतला,रदिक
ये  सब हम  नही  समझते |

हम  भी  ये सब  सीखना चाहे
ताकि खालिस ग़ज़ल लिख पाए
हम भी खुदकी  महफ़िल सजाए
और ग़ज़लो की दीवानी कहलाए.|

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