गुलमोहर तुम्हे मेरी कसम

गुलमोहर
तुम्हे मेरी कसम
सच सच बताना
तुम्हारे सलोने रूप की
छाव तले
जब शरमाई थी मैं
पहेली बार
क्या नही मची थी
केसरिया सनसनी तुम्हारे
मनभावन पत्तों के भीतर?
जब रखा था मैं ने
ज़िंदगी का पहला
गुलाबी प्रेम पृष्ट
क्या नही खिलखिलाई थी
तुम्हारी ललछोही कलियाँ?

गुलमोहर
सच सच बताना
जब पहली बार मेरे भीतर
लहरे उठी थी मासूम प्रेम की
तब तुम थे न मेरे साथ?
कितनी सिंदूरी पत्तियाँ
झरी थी तुमने मेरे उपर
जब मैं नितांत अकेली थी तो
क्यूँ नही बढ़ाया
अपना हाथ?

गुलमोहर
सच सच बताना
बस एप्रिल- मई में पनपते
प्यार के साथी हो?
जुलाइ-अगस्त के दिनो में
जब रोया मेरी आँखों का
सावन
तब क्यूँ नही आए
मुझे सहलाने?

गुलमोहर
सच सच बताना
क्या मेरा प्यार
खरा नही था?
क्या उस वक़्त तुम्हारा
तन हरा नही था,
क्या तब आकाश का सावन
तुम पर झरा नही था ?

कवियत्री – फाल्गुनी
(lokmat papar dec2010)

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गुलमोहर

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 सी शीश है तुझमें ,खिची चली आती हूँ
साथ मेरे मन की तरंगे, तुमसे बाटने  लाती हूँ |

तुमसे मेरा रिश्ता है , मेरे बचपन सा सुहाना
तेरे रंगरूप से मोहित मैं,सुनती हूँ तेरा तराना |

फ़िज़ाओं का रंग बदले,मौसम भी बदलता रेहता
जब तूमपे बहा सजती,मेरा रोम रोम है खिलता |

ग्रीष्म ऋतु में आते हो,सावन की ख़ुशी दे जाते हो
जहाँ भी जाती हूँ मैं,मेरे मन में समाए होते हो |

ना जानू तुम कौन हो मेरे,प्रियतम या सखा हो
बेनाम ही रेहने दो ये रिश्ता,नाम में क्या रखा है |

इतना समझती हूँ मैं,बरसों का अपना अफ़साना
 जब भी तेरी छाया में,हरदम प्यार के फूल बरसाना |

ज़िंदगी की  मुश्किल राहों में , तेरे फूल चुन चुन लाती हूँ
तेरे संग होने के एहसास से ही,कितना सुकून पाती हूँ |

लालरे फूलपन्नो की चुनरी से,तेरा रूप ग़ज़ब का निखरता है
मेरे दिल के आँगन में आज भीवो गुलमो बिखरता  है |

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