ताश सी ज़िंदगी

ताश सी ज़िंदगी

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लगती है हमे कभी कभी
ये ज़िंदगी ताश की डी सी
इंसान सब ताश के पत्ते
खेल खेलता वो उपरवाला जी
मन में आया वो ताश दिखाया
ज़रूरत जिसकी वो पत्ता छिपाया
जब लगता अब हम जीत रहे है
तिकड़म चाल से फिर हराया
हम भी तो कुछ कम ऩही
हम में भी भरा जोश वही
खेलेंगे बाजी पल पल की
जब तक साथ उम्मीद कल की
कोई एक कोशिश सफल होगी ही
मन्झे हुए खिलाड़ी है हम भी |

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सवाल पर सवाल खड़े ज़िंदगी के
ताश के उपर ताश रखे हो जैसे
हवा संग सदा ही उड़ते रहते है
जवाब ढूँढने उनके,पकड़े तो कैसे?

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एक के उपर एक रचाया,सजाया
ताश का खूबसूरत बंगला बनाया
खुशियों के दरवाज़े और खिड़कियाँ
हँसी का खिलखिलता झूमर लगाया
एक  हवा का तेज मंडराता भवर
मेहमान बनकर अंदर तक आया
साथ ले गया सारे ताश के पत्ते
तब से हर कोने में मातम सा छाया |

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ताश के पत्तो का ये खेल,सदियों से
हम भी पैनी नज़र से देख रहे है
हर ताश के साथ पीस पीस कर
जीतने की कला अब सिख रहे है |

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तुम हो बादशाह  ल्तनत के
हम भी मुक़ाबले में कम ऩही
बेगम के खिताब से नवाज़े गये
चाहे ताश की दुनिया के सही |